दुनिया का पहला सफेद बाघ जो रविवार को पीता था सिर्फ दूध, पढ़ें रीवा के 'मोहन' की कहानी

दुनिया का पहला सफेद शेर मोहन रविवार के दिन मांस नहीं खाता था. वह ऐसा क्यों करता था यह कोई नहीं जान पाया. मोहन को रविवार के दिन केवल दूध दिया जाता था.

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दुनिया के पहले सफेद बाघ मोहन की कहानी

White Tiger Mohan : दुनिया के सबसे पहले सफेद बाघ मोहन (First White Tiger of the World Mohan) को 1951 में सीधी (Sidhi) जिले के बरगढ़ी के पंखोरा के जंगल में पकड़ा गया था. उसकी मौत 18 दिसंबर 1969 को हुई थी. दुनिया भर में आज जितने भी सफेद बाघ हैं वह इसी बाघ मोहन (Mohan) की संतान हैं. मोहन को इस दुनिया से गए पूरे 54 साल हो गए लेकिन रीवा (Rewa) वालों को लगता है कि यह कल की ही बात है. 

कैसे पकड़ा गया था मोहन?

दुनिया की नजर में आए पहले सफेद बाघ मोहन के पकड़े जाने की कहानी भी अद्भुत है. तत्कालीन रीवा महाराजा मार्तंड सिंह जोधपुर के राजा अजीत सिंह के साथ सीधी जिले के बरगढ़ी के पंखोरा जंगल में शिकार खेलने गए थे. इसी दौरान एक गुफा के पास एक बाघिन अपने तीन शावकों के साथ नजर आई. महाराजा ने बाघिन और उसके दो शावको को मार दिया. तीसरा शावक पास में ही एक गुफा में छिप गया. वह देखने में बिल्कुल अद्भुत था. महाराज ने उसको पकड़ने का फैसला किया. उसे पकड़कर गोविंदगढ़ के किले में लाया गया और नाम दिया गया 'मोहन'.

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दुनिया भर में जितने सफेद शेर हैं सब मोहन के वंशज

आज पूरी दुनिया में जहां भी सफेद शेर दिखाई देते हैं, वह इसी सफेद शेर मोहन की संतानें हैं. रीवा महाराज मार्तंड सिंह ने मोहन को गोविंदगढ़ के किले में रखा. तीन बाघिन बेगम, राधा और सुकेसी के साथ मोहन को अलग-अलग समय में रखा गया जिनसे मोहन की कुल 34 संतानें हुईं जिसमें से 21 सफेद थीं. बेगम ने 7 बच्चों को जन्म दिया, राधा ने सर्वाधिक 14 और सुकेसी ने 13 बच्चों को जन्म दिया. 

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मोहन की पहली संतान के रूप में सफेद शेर मोहिनी, सुकेसी, राजा और रानी पैदा हुए थे. मोहन की अंतिम संतान मोहन और सुकेसी के बच्चों के रूप में चमेली और विराट पैदा हुए. तत्कालीन महाराजा मार्तंड सिंह ने चमेली को दिल्ली के चिड़ियाघर में दे दिया था. वहीं विराट की मौत गोविंदगढ़ के किले में हो गई थी. इसी के साथ रीवा में सफेद शेरों की पहचान भी खत्म हो गई जिसे बदलते वक्त के साथ दोबारा जिंदा किया गया, 'व्हाइट टाइगर सफारी' के रूप में. 

मोहन रविवार को मांस नहीं खाता था 

दुनिया का पहला सफेद शेर मोहन रविवार के दिन मांस नहीं खाता था. वह ऐसा क्यों करता था यह कोई नहीं जान पाया. मोहन को रविवार के दिन केवल दूध दिया जाता था. मोहन की मौत 1969 को हुई. मोहन की मौत की खबर सुनकर महाराज कई दिन तक अपने कमरे से नहीं निकले थे. मोहन का अंतिम संस्कार पूरे राज्यकीय सम्मान के साथ हुआ था.

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मार्तंड सिंह और मोहन में अद्भुत संबंध

दुनिया को पहले सफेद शेर से परिचय कराने वाले तत्कालीन महाराजा मार्तंड सिंह और मोहन के बीच एक गहरा नाता था. महाराज अपना काफी समय गोविंदगढ़ के किले में मोहन को देते थे. उसके साथ फुटबॉल खेलते थे. ऊंचाई पर महाराज होते थे, बाड़े में मोहन. महाराजा मार्तंड सिंह के पुत्र वर्तमान महाराजा पुष्पराज सिंह बताते हैं कि बड़ा अद्भुत लगता था, पिताजी को एक बाघ के साथ खेलते हुए देखना. मोहन का इतना सम्मान था, उन्हें कोई नाम से नहीं बुलाता था, मोहन के आगे सभी कोई जी लगाया करते थे. आज मोहन को गए हुए पूरे 54 साल हो गए .लेकिन आज भी रीवा के लोग मोहन को याद करते हैं, दुनिया के पहले सफेद शेर के रूप में.

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