पैर छीना, ज़िंदगी बदली ! इंजीनियर को 14 साल बाद मिला इंसाफ़, अस्पताल को 20 लाख का झटका

ये कहानी है विदिशा के सुरजीत सिंह जाट की. एक सड़क हादसे के बाद इलाज में हुई गलती ने इस युवा इंजीनियर का पैर छीन लिया और ज़िंदगी हमेशा के लिए व्हीलचेयर पर आ गई.

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Vidisha Medical Negligence: कभी-कभी ज़िंदगी अचानक एक झटके में पलट जाती है. एक हादसा होता है, फिर होती है डॉक्टरों की लापरवाही, और बस... एक इंसान की पूरी दुनिया बदल जाती है. ये कहानी है विदिशा के सुरजीत सिंह जाट की. एक सड़क हादसे के बाद इलाज में हुई गलती ने इस युवा इंजीनियर का पैर छीन लिया और ज़िंदगी हमेशा के लिए व्हीलचेयर पर आ गई. ये बात 2011 की है. एक हादसे के बाद सुरजीत का इलाज भोपाल के नर्मदा अस्पताल में शुरू हुआ. सब कुछ ठीक चल रहा था, लेकिन इलाज के दौरान मेडिकल टीम ने कथित तौर पर बड़ी लापरवाही की. ऐसा कहा जा रहा है कि डॉक्टरों के गलत फैसलों के कारण उन्हें अपना एक पैर खोना पड़ा.

हादसा और उसके बाद लापरवाही

दरअसल एक हादसे के बाद जब उनका भोपाल के नर्मदा अस्पताल में इलाज चल रहा था. आरोप है कि डॉक्टरों की गलती से उनके पैर में संक्रमण (Infection) तेज़ी से फैल गया. नतीजा? डॉक्टरों ने सुरजीत के सामने एक भयानक सवाल खड़ा कर दिया—या तो पैर बचेगा, या ज़िंदगी! अंत में, उन्हें अपना पूरा पैर कटवाना पड़ा. सुरजीत की नई-नई शादी हुई थी, एक मासूम-सा बच्चा था, और आंखों में ढेर सारे सपने थे. चंद लापरवाहियों ने एक झटके में सब कुछ बिखेर दिया.

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14 साल की लंबी कानूनी जंग

हालांकि अस्पताल की गलती को साबित करना आसान नहीं था. सुरजीत और उनके परिवार ने हार नहीं मानी. उन्होंने ज़िला कंज़्यूमर फोरम से लेकर स्टेट फोरम और हाईकोर्ट तक 14 साल तक कानूनी लड़ाई लड़ी. इस दौरान अस्पताल भी बार-बार अपील करता रहा और खुद को बचाने के लिए फर्जी कागज़ात तक पेश किए. इस पूरे मामले में अभी तक नर्मदा अस्पताल का पक्ष सामने नहीं आया है. जब आएगा तो हम उसे भी आपके सामने रखेंगे.

मिला 20 लाख का मुआवज़ा, पर पैर नहीं

आखिरकार, 8 सितंबर 2025 को स्टेट कंज़्यूमर फोरम ने अपना फ़ैसला सुनाया. कोर्ट ने साफ माना कि अस्पताल की लापरवाही हुई थी और उन्हें सुरजीत को 20 लाख रुपये का मुआवज़ा देने का आदेश दिया. जाहिर है यह फ़ैसला उन मरीज़ों के लिए उम्मीद की किरण है जो अस्पतालों की लापरवाही झेलते हैं. बहरहाल सुरजीत को इंसाफ तो मिला लेकिन कई गहरे सवाल भी खड़े होते हैं. मसलन- एक आम आदमी को अपनी बात साबित करने में 14 साल क्यों लग गए. क्या 20 लाख रुपये का मुआवज़ा उस दर्द की भरपाई कर सकता है, जो एक युवा इंजीनियर ने अपना पैर खोकर झेला?