Success Story: दोस्तों ने उड़ाया मजाक, पिता ने 2 साल तक नहीं की बात, सारी बेड़िया तोड़ सीमा ने हासिल की ये मुकाम

Seema Raikwar Success Story: सीमा के गांव का माहौल ऐसा था जहां लड़कियों को घर की चारदीवारी तक ही सीमित रहने की सलाह दी जाती है. सीमा का सपना पुलिस विभाग में जाने का था, इसलिए पिता ने उन्हें पढ़ाई के लिए सागर भेज दिया. इसी दौरान एक दिन वह अपनी सहेली के साथ जिम पहुंचीं. वहां लड़कियों को वेट ट्रेनिंग करते देख वह प्रभावित हुईं और पावर लिफ्टिंग में जाने का फैसला किया.

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Seema Raikwar Success Story: मेडिकल और ब्यूटी पार्लर में किया काम, रोज ट्रेन से 70 KM करती थी अपडाउन.

Seema Raikwar Success Story: सागर के एक छोटे से गांव से निकलकर 25 वर्षीय सीमा रैकवार ने संघर्ष, साहस और संकल्प की मिसाल पेश की है. आर्थिक तंगी, सामाजिक ताने और पारिवारिक नाराजगी के बीच सीमा ने अपने सपनों को मरने नहीं दिया और हाल ही में सीहोर में आयोजित पावर लिफ्टिंग चैंपियनशिप में सिल्वर मेडल जीतकर जिले का नाम रोशन किया है.

जहां चारदीवारी के भीतर रहती है लड़कियां

सीमा एक साधारण परिवार से आती हैं. गांव का माहौल ऐसा था जहां लड़कियों को घर की चारदीवारी तक ही सीमित रहने की सलाह दी जाती है. सीमा का सपना पुलिस विभाग में जाने का था, इसलिए पिता ने उन्हें पढ़ाई के लिए सागर भेज दिया. इसी दौरान एक दिन वह अपनी सहेली के साथ जिम पहुंचीं. वहां लड़कियों को वेट ट्रेनिंग करते देख वह प्रभावित हुईं और पहली बार उन्हें पावर लिफ्टिंग के बारे में पता चला. उसी दिन उन्होंने तय कर लिया कि वह इसी खेल में अपना करियर बनाएंगी.

पिता ने किया विरोध

जब गांव में परिवार को इसकी जानकारी मिली तो पिता ने कड़ा विरोध किया. उनका कहना था कि “बेटी जिम जाएगी तो समाज क्या कहेगा?” बात इतनी बढ़ी कि पिता ने शादी की तैयारी शुरू कर दी, लेकिन सीमा ने साफ इंकार कर दिया. इसके बाद पिता ने दो साल तक उनसे बात नहीं की और पढ़ाई के लिए आर्थिक मदद भी बंद कर दी.

मेडिकल और ब्यूटी पार्लर में किया काम, रोज 70 KM ट्रेन से करती थी अपडाउन

अब सीमा के सामने दोहरी चुनौती थी- एक तरफ पावर लिफ्टिंग में पहचान बनाना और दूसरी ओर आर्थिक तंगी से जूझना. उन्होंने मेडिकल स्टोर और ब्यूटी पार्लर में काम कर अपने खर्च और ट्रेनिंग की फीस जुटाई. वह रोजाना सागर से बीना तक लगभग 70 किलोमीटर का सफर ट्रेन से तय करती थीं. सुबह घर का काम निपटाकर 6 बजे निकल जातीं और देर शाम लौटतीं. कई बार टिकट के पैसे भी नहीं होते थे और ट्रेन में टीसी द्वारा पकड़े जाने की नौबत आ जाती थी.

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दोस्तों ने बनाया मजाक

शुरुआती दौर में दोस्तों और परिचितों ने उनका खूब मजाक उड़ाया. जिम करने से शरीर में आए बदलावों पर तंज कसते हुए कहा जाता, “लड़कों जैसी दिखती हो, लड़कों की तरह चलती हो.” इन तानों ने उन्हें मानसिक रूप से तोड़ा... एक समय ऐसा भी आया जब उन्होंने बाहर निकलना कम कर दिया. लगातार असफलताओं ने उन्हें खेल छोड़ने तक पर मजबूर कर दिया था, लेकिन उनके गुरु ने उनका हौसला बनाए रखा.

अब हासिल की सिल्वर मेडल

संघर्ष का यही दौर उनकी असली परीक्षा बना. मेहनत और लगन का परिणाम तब मिला जब सीहोर में आयोजित पावर लिफ्टिंग चैंपियनशिप में उन्होंने शिवपुरी की खिलाड़ी को कड़ी टक्कर देते हुए सिल्वर मेडल अपने नाम किया. यह उपलब्धि न सिर्फ उनके लिए बल्कि पूरे सागर जिले के लिए गर्व का क्षण है. सीमा का कहना है कि यह तो बस शुरुआत है. अब उनका लक्ष्य गोल्ड मेडल जीतकर प्रदेश और देश स्तर पर अपनी पहचान बनाना है. उनका संघर्ष उन बेटियों के लिए प्रेरणा है जो सीमित संसाधनों के बावजूद बड़े सपने देखने का साहस रखती हैं.

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