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SIR प्रक्रिया पर मऊगंज में सियासी तूफ़ान, पूर्व विधायक ने 10 हजार नाम हटाने की साजिश का लगाया आरोप

Politics on SIR: मामले में पूर्व विधायक लक्ष्मण तिवारी ने भी गंभीर आरोप लगाए हैं. उनका कहना है कि कुछ बूथ लेवल कर्मचारियों (BLE) के माध्यम से बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम हटाने के आवेदन लगाए गए हैं. उन्होंने दावा किया कि यह संख्या दस हजार से अधिक हो सकती है.

SIR प्रक्रिया पर मऊगंज में सियासी तूफ़ान, पूर्व विधायक ने 10 हजार नाम हटाने की साजिश का लगाया आरोप
vimlesh dwivedi

SIR in Madhya Pradesh: मध्य प्रदेश के मऊगंज जिले में चल रही विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) प्रक्रिया अब सियासी और प्रशासनिक विवाद का केंद्र बनती जा रही है. मतदाता सूची में नामों के संशोधन और विलोपन की प्रक्रिया को लेकर कई जनप्रतिनिधियों और स्थानीय लोगों ने गंभीर सवाल उठाए हैं. आरोप लगाए जा रहे हैं कि इस प्रक्रिया का उपयोग निष्पक्ष पुनरीक्षण के बजाय राजनीतिक उद्देश्य से किया जा रहा है.

हनुमना जनपद के पूर्व सदस्य इंद्रमणि द्विवेदी और उनकी पत्नी ने प्रशासनिक कार्रवाई पर आशंका जताते हुए दावा किया कि उनके परिवार और समर्थकों के नाम सुनियोजित तरीके से मतदाता सूची से हटाने की कोशिश की जा रही है. उनका कहना है कि इस संबंध में उन्होंने कई बार संबंधित अधिकारियों से संपर्क करने की कोशिश की, लेकिन उन्हें संतोषजनक जवाब नहीं मिला. उन्होंने इस पूरे मामले को लेकर जिला प्रशासन के समक्ष शिकायत भी दर्ज कराई है.

पूर्व विधायक लक्ष्मण तिवारी ने किया बड़ा दावा

मामले में पूर्व विधायक लक्ष्मण तिवारी ने भी गंभीर आरोप लगाए हैं. उनका कहना है कि कुछ बूथ लेवल कर्मचारियों (BLE) के माध्यम से बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम हटाने के आवेदन लगाए गए हैं. उन्होंने दावा किया कि यह संख्या दस हजार से अधिक हो सकती है. तिवारी का आरोप है कि इस प्रक्रिया के जरिए राजनीतिक रूप से प्रभावशाली या विरोधी माने जाने वाले लोगों को निशाना बनाया जा रहा है.

प्रक्रिया की पारदर्शिता पर उठे सवाल

स्थानीय स्तर पर यह चर्चा तेज हो गई है कि क्या SIR प्रक्रिया में पर्याप्त भौतिक सत्यापन और नोटिस जारी किए बिना नाम काटने की कार्रवाई की जा रही है. कई लोगों का कहना है कि उन्हें अपने नाम हटाए जाने की सूचना समय पर नहीं मिल रही, जिससे भ्रम और असंतोष बढ़ रहा है. लोकतांत्रिक व्यवस्था में मतदाता सूची की सटीकता बेहद अहम मानी जाती है. ऐसे में पारदर्शिता और निष्पक्षता को लेकर उठ रहे सवाल प्रशासन के लिए चुनौती बन सकते हैं.

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अब तक इस मामले में जिला प्रशासन या निर्वाचन विभाग की ओर से कोई विस्तृत आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है. हालांकि, बढ़ते आरोपों और जनचर्चा के बीच माना जा रहा है कि जल्द ही इस पर स्पष्ट स्थिति सामने आ सकती है.

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