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This Article is From Feb 08, 2026

रहस्यों से भरा है MP का ये किला: यहां मौजूद है लोहे को गोल्ड बनाने वाला 'पारस पत्थर'! 14 बार विदेशी शासकों ने किया था हमला

Raisen Fort Mystery: रायसेन के किले पर कई विदेशी शासकों ने हमले किए थे. कहा जाता है कि ये शासक पारस पत्थर के लिए हमला करते थे. हालांकि यह आज भी रहस्य बना हुआ है. इसके अलावा किले की कई सरंचनाएं शोध का विषय बनी हुई है.

रहस्यों से भरा है MP का ये किला: यहां मौजूद है लोहे को गोल्ड बनाने वाला 'पारस पत्थर'! 14 बार विदेशी शासकों ने किया था हमला

Raisen Fort Mystery: रायसेन जिले का ऐतिहासिक किला अपने भीतर कई रहस्य समेटे हुए है. यहां का एक रहस्य पारस पत्थर है तो दूसरी किले की चारदीवारी के भीतर की संरचनाएं... इतना ही नहीं इस किले पर 14 बार आक्रमण भी हुए. तो वहीं इतिहास में यहां हुए दो अलग-अलग जौहर भी दर्ज है. एक अग्नि जौहर, जिसमें रानी दुर्गावती ने 700 राजपूतानियों के साथ बलिदान दिया था तो वहीं एक रानी ने अपने सम्मान की रक्षा के लिए पति से गला कटवाकर बलिदान दिया था. बता दें कि इस किले में सोमेश्वर महादेव मंदिर स्थित है, जो साल में सिर्फ एक बार महाशिवरात्रि पर खुलता है.

लोहे को सोने में बदल देता है पारस पत्थर

कहा जाता है कि जब रायसेन राज्य की रानी की खूबसूरती के चर्चे शेरशाह सूरी तक पहुंचे, तो उसने इस किले पर आक्रमण कर दिया. मान्यता है कि आक्रमण के दौरान राजा ने अपनी रानी का गला काट दिया, ताकि दुश्मन उसे अपमानित न कर सके. यह भी कहा जाता है कि यहां के राजा परमार के पास पारस पत्थर था, जो लोहे को सोने में बदल देता था और उसी की चाह में शेरशाह सूरी ने रायसेन के किले पर हमला किया था.

तोपों और गोलों की झेली मार

रायसेन का यह किला इतिहास की एक अनूठी दास्तान है. 11वीं शताब्दी के आसपास बने इस किले पर अब तक 14 बार अलग-अलग शासकों ने आक्रमण किए. तोपों और गोलों की मार झेलने के बावजूद यह किला आज भी सीना तानकर खड़ा है.
भोपाल से करीब 45 किलोमीटर दूर रायसेन में यह किला करीब 1500 फीट ऊंची पहाड़ी पर स्थित है और लगभग 10 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैला हुआ है. इतिहासकारों के अनुसार, रायसेन किले का निर्माण लगभग 1000 ईसा-पूर्व के आसपास हुआ था.

इस किले में वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम

रायसेन किले की चारदीवारी के भीतर कई संरचनाएं मौजूद हैं, जो भारत के अन्य किलों में देखने को मिलती हैं, लेकिन यहां कुछ ऐसी तकनीक भी है, जो इसे बाकी किलों से अलग बनाती है. वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम करीब 10 वर्ग किलोमीटर में फैली है, जो पहाड़ी पर गिरने वाला बारिश का पानी भूमिगत नालियों के जरिए किले परिसर में बने एक कुंड में एकत्र होता है.

नालियां कहां से आती हैं, कितनी हैं और पानी कहां से बहकर पहुंचता है... यह रहस्य आज भी कोई नहीं सुलझा पाया. यह तत्कालीन शासकों की दूरदृष्टि और वैज्ञानिक समझ को दर्शाता है. इत्रदान महल का ईको साउंड सिस्टम इत्रदान महल के भीतर दीवारों में बने आले एक अद्भुत ईको साउंड सिस्टम का उदाहरण हैं. एक दीवार के आले में फुसफुसाने पर करीब 20 फीट दूर दूसरी दीवार के आले में आवाज साफ सुनाई देती है. यह तकनीक आज भी शोध का विषय बनी हुई है.

रायसेन किले में क्या है खास?

किले के भीतर सोमेश्वर महादेव मंदिर, हवा महल, रानी महल, झांझिरी महल, वारादरी, शीलादित्य की समाधि, धोबी महल, कचहरी, चमार महल, बाला किला, हम्माम और मदागन तालाब स्थित हैं.

रायसेन किला पर हुए 14 हमले

रायसेन पर 1223 में अल्तमश, 1250 में सुल्तान बलबन, 1283 में जलालुद्दीन खिलजी, 1305 में अलाउद्दीन खिलजी, 1315 में मलिक काफूर, 1322 में मोहम्मद बिन तुगलक, 1511 में साहिब खान, 1532 में हुमायूं, 1543 में शेरशाह सूरी, 1554 में बाजबहादुर, 1561 में अकबर, 1682 में औरंगजेब, 1754 में फैज मोहम्मद ने हमले किए थे.

  • महत्वपूर्ण ऐतिहासिक घटनाएं 17 जनवरी 1532 की है, जब बहादुर शाह द्वारा रायसेन दुर्ग का घेराव किया गया था. जिसके बाद 6 मई 1532 को रानी दुर्गावती ने 700 राजपूतानियों के साथ जौहर कर लिया. 
  • 10 मई 1532 को राजा सिलहादी, लक्ष्मणसेन और राजपूत सेना का बलिदान है.
  • जून 1543 को रानी रत्नावली सहित महिलाओं और बच्चों ने अपना बलिदान दिया था.
  • जून 1543 में शेरशाह सूरी के विश्वासघाती हमले में राजा पूरनमल ने बलिदान दिया था.

साल में एक बार खुलता है महादेव मंदिर का ताला

किले पर स्थित सोमेश्वर महादेव मंदिर का ताला महाशिवरात्रि के अवसर पर ही खोला जाता है. 1974 में नगरवासियों के आंदोलन के बाद तत्कालीन मुख्यमंत्री प्रकाशचंद्र सेठी ने स्वयं आकर शिवलिंग की प्राण-प्रतिष्ठा कराई. तब से हर महाशिवरात्रि पर यहां विशाल मेला लगता है. बता दें कि किले में स्थित एक दरगाह हिंदू-मुस्लिम एकता और गंगा-जमुनी तहज़ीब की मिसाल भी है.

इतिहास की इतनी बड़ी धरोहर होने के बावजूद रायसेन का किला आज भी प्रशासनिक उदासीनता का शिकार है. पर्यटक यहां आते हैं, लेकिन सुविधाओं के नाम पर हालात बेहद खराब हैं. मुख्य द्वार पर अक्सर ताला लगा रहता है और पर्यटकों को पैदल ही कठिन चढ़ाई कर किले तक पहुंचना पड़ता है.

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