900 वर्ष प्राचीन 'अबार माता मंदिर' की कहानी बेहद अनूठी, मिलता है संतान सुख!

Navratri Special :  नवरात्रि (Navratri 2025) के पावन पर्व पर मां के भक्तों में काफी उत्साह है. वहीं, इस खास मौके पर आपको बता रहे हैं 'अबार माता' के मंदिर की रोचक कहानी.

विज्ञापन
Read Time: 4 mins

Story of Abar Mata Temple : नवरात्रि के पावन दिन चल रहे हैं. इस विशेष मौके पर मां के भक्तों के लिए एक खास कहानी है.चलिए जानते हैं 'अबार माता की महिमा' के बारे में... बुंदेलखंड के छतरपुर (Chhatarpur) जिले की सीमा पर स्थित 'अबार माता' का मंदिर (Abar Mata Temple) अपने आप में बेहद अनूठा एवं 'सिद्ध पीठ' स्थल है, जिले मुख्यालय से  100 किलोमीटर दूर मौजूद है. आपको बता दें, नौ-सौ साल पुराने इस मंदिर  के बारे लोगों की आस्था इतनी गहरी है कि वे मानते हैं कि यहां आने भर से सारे क्लेश दूर हो जाते हैं. इस मंदिर में एक चट्टान मौजूद है, जिसके बारे में कहा जाता है कि कुछ समय पहले तक ये केवल कुछ फीट की थी, लेकिन धीरे-धीरे इसका आकार बढ़ते-बढ़ते आज क़रीब 70 फ़ीट तक पहुंच चुका है. कहा जाता है कि इस चट्टान को छूने से ही निःसंतान को संतान की प्राप्ति हो जाती है.

आल्हा-उदल ने बनवाया था मंदिर

लोग इस चट्टान का जुड़ाव भगवान शिव जी से मानते हैं. क्योंकि कहा जाता है कि हर महाशिवरात्रि के दिन इसकी लंबाई एक तिल के बराबर बढ़ जाती है . बताया जाता है कि आल्हा-उदल ने इस मंदिर को बनवाया था. एक रात महोबा से माधौगढ़ जाते वक्त वे जब यहां पहुंचे, तो उन्हें अबेर हो गई, जिसका अर्थ बुंदेलखंडी में शाम गहराना होता है. जिसके चलते उन्होंने यहीं पर अपना डेरा डाल दिया. हर रोज की तरह रात में जब अपनी आराध्य देवी का आह्वान किया, तो मां ने उन्हें दर्शन दिए. बाद में उन्होंने यहां उनका मंदिर बनवा दिया. ये अबार माता के नाम से प्रसिद्ध हुईं .

Advertisement

ऐसे चला मंदिर का पता

घने जंगल के बीच होने के कारण लोगों को इसके बारे में ज्यादा पता नहीं चल सका. इसे भूलते गए, फिर चंदेल शासन काल के दौरान एक बार उनके लड़ाका सरदार यहां आए .वे यहां रास्ता भटक गए. उन्होंने इसी जंगल में विश्राम किया . यहां उन्हें किसी शाक्ति का अहसास हुआ तो उन्होंने उसकी तलाश की. उन्हें यहां देवी जी का मंदिर मिला. यहां प्राचीन समय में चट्टान के ऊपर मठिया बनाई गई थी, जिसमें कभी अबार माता की मूर्ति हुआ करती थी .

Advertisement

इस चट्टान को छूने से भक्तों की मुराद पूरी होती है

अब इस मूर्ति को वहां ले निकालकर नीचे स्थापित कर दिया गया. एक मंदिर बना दिया गया . माना ये भी जाता है कि मंदिर बनने से पहले ये चट्टान बहुत तेजी से बढ़ रही थी. लेकिन अब ये साल में सिर्फ एक तिल के बराबर ही बढ़ती है. आस्था है कि इस चट्टान को छूने से भक्तों की मुराद पूरी होती है. लेकिन इस चट्टान पर हाथ रखने का एक अपना ही अलग तरीक़ा है. पहले हाथ को उल्टा रखकर मन्नत मांगों.फिर पूरी हो जाने पर सीधे रखकर मां को धन्यवाद दो .

Advertisement

ये भी पढ़ें- 500 फीट ऊंचे पर्वत के शिखर पर विराजमान मां बम्बरवैनी मंदिर पवित्र स्थल घोषित, कैबिनेट ने दी मंजूरी

इन राज्यों से भी आते हैं लोग

अबार माता के मंदिर तक पहुंचने के लिए आपको लगभग 50 सीढ़ियां चढ़नी होती हैं . दूर-दूर से यहां श्रद्धालु मां के दर्शन के लिए आते हैं. यहां बैसाख की पूर्णिमा के दिन से करीब 15 दिनों का वार्षिक मेला का भी भव्य आयोजन होता. मेला में महाराष्ट्र,राजस्थान,मध्यप्रदेश, उत्तर प्रदेश सहित तमाम राज्यों से दुकानदार आते हैं. लाखों की संख्या में श्रद्धालुओं की भीड़ देखी जाती है.

ये भी पढ़ें- अगली नवरात्रि तक बस्तर लाल आतंक से मुक्त होगा! केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने दंतेवाड़ा से किए कई ऐलान