मध्य प्रदेश के झाबुआ में आदिवासी समाज का सबसे प्रमुख और पारंपरिक पर्व भगोरिया इन दिनों अपने पूरे शबाब पर है. जिलेभर में उत्सव की मस्ती बिखरने लगी है. बांसुरी की मधुर तान और मांदल की गूंजती थाप पर थिरकते कदम, रंग-बिरंगे परिधानों में सजे लोग और मेलों की चहल-पहल ने पूरे जिले को उत्सव नगरी में बदल दिया है.
झाबुआ के भगोर ग्राम से शुरू हुआ आदिवासी समाज का यह पारंपरिक पर्व अब जिले के अलग-अलग हिस्सों में रंग जमा चुका है. लगभग एक सप्ताह तक चलने वाले इस उत्सव में संस्कृति, परंपरा और उमंग का अनोखा संगम देखने को मिल रहा है.
भोगर्य देव की आराधना से जुड़ी परंपरा
मान्यता है कि भृगु ऋषि की तपोस्थली रहे भगोर ग्राम से इस पर्व की शुरुआत हुई. आदिवासी समाज भोगर्य देव को शिव-पार्वती का स्वरूप मानता है और उनकी आराधना करता आया है. उन्हीं की उपासना और उनके नाम से प्रारंभ हुआ ‘भोंगर्य' पर्व समय के साथ आधुनिक दौर में ‘भगोरिया' कहलाया.
स्थानीय निवासी राहुल भानपुरिया ने बताया कि यह पर्व केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक नहीं है, बल्कि यह आदिवासी समाज की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत को भी दर्शाता है.
mp news jhabua bhagoria festival 2026 Celebrated in Madhya Pradesh
फसल कटाई के बाद खुशियों का उत्सव
भगोरिया केवल एक पर्व नहीं, बल्कि आदिवासी अस्मिता और सामाजिक जुड़ाव का प्रतीक है. पूरे वर्ष समाज के हर वर्ग को इस पर्व का इंतजार रहता है. जो लोग रोजगार या अन्य कारणों से अपने गांव से दूर रहते हैं, वे भी इस अवसर पर अपने गांव लौटकर उत्सव की मस्ती में शामिल होते हैं.
सोमसिंह सोलंकी के अनुसार मान्यता है कि फसल कटाई के बाद समृद्धि से लबरेज़ समाज मेलों के माध्यम से अपनी खुशी जाहिर करता है. परंपरा और पारंपरिकता के रंगों से सजे इन मेलों में झूलों का विशेष आकर्षण रहता है. बड़ी संख्या में ग्रामीण परिवार सहित इन मेलों का आनंद लेने पहुंचते हैं. बच्चे हों या अधेड़, सात दिनों तक चलने वाले इस उत्सव में सभी पूरे उत्साह के साथ भाग लेते हैं.
वेशभूषा, मांदल और बांसुरी की गूंज
भगोरिया पर्व में पारंपरिक वेशभूषा और गहनों की एकरूपता विशेष आकर्षण का केंद्र होती है. रंगीन साफा, पारंपरिक आभूषण और विशेष परिधान समाज की सांस्कृतिक पहचान को जीवंत करते हैं.
मांदल की थाप और बांसुरी की तान पर्व की रंगत को और बढ़ा देती है. इन सुरों पर थिरकते कदम केवल नृत्य नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही परंपरा की अभिव्यक्ति होते हैं.
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परंपरा बनाम आधुनिकता
कालूसिंह व कमलसिंह आदि का मानना है कि नई पीढ़ी को भी पारंपरिक वेशभूषा और रीति-रिवाजों के साथ इस पर्व में शामिल होना चाहिए. उनका कहना है कि पर्व पर चढ़ता आधुनिकता का रंग कहीं न कहीं इसकी मूल सुंदरता को प्रभावित कर रहा है.
यही वजह है कि समाजजन नई पीढ़ी से अपनी संस्कृति और परंपराओं से जुड़े रहने की अपील कर रहे हैं. उनका मानना है कि सामाजिक संगठनों और समाज के वरिष्ठों को आगे आकर पारंपरिक स्वरूप को बनाए रखने के लिए पहल करनी चाहिए, ताकि होली पूर्व तक लगने वाले भगोरिया मेलों में पर्व की मूल भावना और रंगत कायम रह सके.