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This Article is From Apr 08, 2026

निजी स्कूलों के मोनोपॉली सिंडिकेट पर मध्य प्रदेश HC सख्त, FIR रद्द करने से इनकार

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने निजी स्कूलों द्वारा बनाए गए कथित मोनोपॉली सिंडिकेट के मामले में सख्त रुख अपनाया है. कोर्ट ने आरोपितों को राहत देने से इनकार करते हुए कहा कि मामला गंभीर आपराधिक साजिश से जुड़ा है.

निजी स्कूलों के मोनोपॉली सिंडिकेट पर मध्य प्रदेश HC सख्त, FIR रद्द करने से इनकार

निजी स्कूलों द्वारा बनाए गए कथित मोनोपॉली सिंडिकेट के मामले में मध्य प्रदेश हाईकोर्ट (Madhya Pradesh High Court) ने सख्त रुख अपनाया है. न्यायमूर्ति बीपी शर्मा की एकलपीठ ने आरोपितों को राहत देने से इनकार करते हुए स्पष्ट किया कि मामला गंभीर आपराधिक साजिश से जुड़ा प्रतीत होता है और प्रथम दृष्टया पर्याप्त साक्ष्य मौजूद हैं. ऐसे में दर्ज एफआईआर को रद्द नहीं किया जा सकता. कोर्ट ने इस प्रकरण में दायर सभी 13 याचिकाओं को खारिज कर दिया.

अदालत ने कहा कि स्कूल प्रबंधन, पुस्तक विक्रेताओं और प्रकाशकों के बीच मिलीभगत के आरोप बेहद गंभीर हैं, जिनकी पूरी जांच और सुनवाई ट्रायल के माध्यम से ही संभव है. कोर्ट ने यह भी संकेत दिया कि शिक्षा के नाम पर मुनाफाखोरी और अभिभावकों का शोषण बर्दाश्त नहीं किया जाएगा.

दो वर्ष पूर्व हुई थी कार्रवाई

करीब दो साल पहले जबलपुर जिला प्रशासन ने निजी स्कूलों के खिलाफ सख्त कदम उठाते हुए ओमती, बेलबाग, संजीवनी नगर, ग्वारीघाट और गोराबाजार थानों में एफआईआर दर्ज कराई थी. यह कार्रवाई तत्कालीन कलेक्टर दीपक सक्सेना के निर्देश पर की गई थी.

ये हैं मुख्य आरोप

  • निर्धारित सीमा से अधिक फीस वसूली
  • डुप्लीकेट ISBN नंबर वाली पुस्तकों की बिक्री
  • अभिभावकों को तय दुकानों से ही किताबें खरीदने के लिए बाध्य करना

इन पर लगे आरोप

इस मामले में जबलपुर और कटनी के कई निजी एवं मिशनरी स्कूलों के प्राचार्य, संचालक और प्रबंधन से जुड़े लोग शामिल हैंय प्रमुख नामों में अतुल अनुपम अब्राहम, लूवि मैरी साठे, एकता पीटर्स, चंद्रशेखर विश्वकर्मा (सेवानिवृत्त प्राचार्य), शशांक श्रीवास्तव और सूर्यप्रकाश वर्मा शामिल हैं.

संगठित सप्लाई चेन का खुलासा

हाईकोर्ट ने अपने अवलोकन में कहा कि स्कूलों, बुकसेलर्स और प्रकाशकों के बीच मिलकर एक मोनोपोलिस्टिक सप्लाई चेन बनाई गई थी. इसके तहत अभिभावकों पर दबाव डालकर महंगी किताबें खरीदवाई जाती थीं, जिससे अवैध लाभ अर्जित किया गया. अदालत ने इसे सामान्य प्रशासनिक त्रुटि नहीं, बल्कि आपराधिक षड्यंत्र का मामला माना.

जमानत के बावजूद राहत नहीं

यद्यपि कई आरोपितों को पूर्व में जमानत मिल चुकी है, फिर भी उन्होंने एफआईआर रद्द कराने के लिए याचिकाएं दायर की थीं, जिन्हें कोर्ट ने खारिज कर दिया. राज्य सरकार की ओर से पेश अधिवक्ता दिनेश प्रसाद पटेल ने कार्रवाई को विधिसम्मत बताया, जिसे अदालत ने स्वीकार किया.

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