Indore: बेबस मां रोकती रही, टूटा बेटा ‘सरकारी सिस्टम’ को सुनाता रहा खरी-खरी, रूह कंपा देगा पूरा मामला 

“मेरे पिता नहीं रहे,” दिनेश चीखा, “मेरी मां देख नहीं सकती. अगर गरीबों की कोई सुनवाई नहीं, तो ये जनसुनवाई किस लिए है?” यह कोई नाटकीय संवाद नहीं था. यह भूख की आवाज़ थी. यह थकान की चीख थी. आइए जानते हैं पूरा मामला... 

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पीड़ित दिनेश प्रजापति.

Madhya Pradesh News: दो दिन पहले मध्य प्रदेश के इंदौर कलेक्टरेट से निकला एक छोटा-सा, कांपता हुआ वीडियो जैसे पूरे समाज के मन पर खरोंच बन गया. कैमरा हिल रहा था, आवाज़ टूट रही थी और सरकारी दफ्तर का लंबा गलियारा उस टूटती आवाज़ का साक्षी बना खड़ा था. एक युवक कलेक्टर दफ्तर के बीचों-बीच खड़ा था गुस्से और विवशता में. शब्द उसके मुंह से नहीं, जैसे उसकी छाती से गिर रहे थे. पास ही उसकी बूढ़ी मां कमज़ोर हाथों से बेटे को थामे उसे रोकने की कोशिश कर रही थी. वह उसे चुप कराना नहीं चाहती थी, बस डरती थी कि बेटे का यह दर्द कहीं उनके लिए नई मुसीबत न बन जाए.

उस युवक का नाम दिनेश प्रजापति है.

“जनसुनवाई हर मंगलवार होती है,” वह रोते-रोते कह रहा था, “मंगलवार हफ्ते में एक ही बार आता है. मैं कितने मंगलवारे आ चुका हूं. गरीबों की कोई सुनता ही नहीं.”

उसकी आवाज़ उन दीवारों से टकरा रही थी, जिन्होंने न जाने कितनी अर्ज़ियां सुनी थीं और शायद भूल भी गई थीं. एक पल ऐसा आया जिसने पूरे प्रदेश का कलेजा चीर दिया. दिनेश अपनी मां के थैले से काग़ज़ छीनने लगा, उन्हें वहीं फाड़ देने की बात कहने लगा. माँ गिड़गिड़ाकर उसे रोक रही थी. वह विधवा है.  ठीक से देख नहीं सकती और एक साल से रुकी पड़ी पेंशन पर ही उसकी ज़िंदगी टिकी है.

“मेरे पिता नहीं रहे,” दिनेश चीखा, “मेरी मां देख नहीं सकती. अगर गरीबों की कोई सुनवाई नहीं, तो ये जनसुनवाई किस लिए है?” यह कोई नाटकीय संवाद नहीं था. यह भूख की आवाज़ थी. यह थकान की चीख थी.यह एक साल के इंतज़ार का एक ही क्षण में फट पड़ना था.

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जब एनडीटीवी दिनेश को इंदौर की कर्मा कॉलोनी में उसके छोटे से किराए के घर में ढूंढकर पहुंचा, तो उसकी आवाज़ में अब शोर नहीं था. बस गहरी थकान थी.

“मैं कलेक्टर दफ्तर इसलिए गया था,” उसने धीरे से कहा, “क्योंकि मेरी मां की पेंशन एक साल से बंद थी. बोले केवाईसी नहीं हुई. एक साल में नगर निगम गया, ज़ोन ऑफिस गया, कलेक्टर दफ्तर गया… हर जगह, कई बार. उस दिन हम सुबह से भूखे-प्यासे थे. तीन-चार घंटे लाइन में खड़े रहे. जब कलेक्टर साहब हमारे पास से निकल गए और किसी ने नहीं सुना तो मैं टूट गया.”

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दिनेश रोज़-दिहाड़ी और छोटे-मोटे काम करता है. परिवार किराए के मकान में रहता है. मां की विधवा पेंशन ₹7,200 कोई राशि नहीं, जीवन का सहारा थी. घटना के बाद केवाईसी पूरी हुई, और रुकी हुई पेंशन खाते में आ गई. लेकिन क्रोध के पीछे और भी पीड़ा थी.

बीमारी से जूझ रहा था दिनेश 

दिनेश वर्षों से पेट की बीमारी से जूझ रहा था. मां की आंखों में तकलीफ़ थी. सिर के पीछे अंदरूनी चोट थी. पैर में दर्द था. वीडियो सामने आने के बाद कलेक्टर ने हस्तक्षेप किया और दोनों का इलाज अरबिंदो अस्पताल में कराया गया. ढाई घंटे तक डॉक्टर लगे रहे. दवाइयां मिलीं. शरीर के घाव तो दिख ही रहे थे मन के घावों को भी पहली बार किसी ने देखा.

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“अब सब ठीक है,” दिनेश ने कहा, “कलेक्टर साहब ने सुना. हमारा काम हो गया.”

लेकिन वीडियो मिट जाने के बाद भी एक सवाल रह जाता है, गरीब को सुने जाने के लिए चीखना क्यों पड़ता है? सम्मान अक्सर अपमान के वायरल होने के बाद ही क्यों मिलता है?दिनेश प्रजापति का फूट पड़ना विद्रोह नहीं था, बेबसी की आवाज़ थी ... शुक्र है सुनी गई.

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