ग्वालियर-चंबल में बंदूक के लिए 'जंग'; लाइसेंस ट्रांसफर को लेकर भाइयों-परिजनों में बढ़े झगड़े और विवाद

ग्वालियर-चंबल में लाइसेंसी बंदूकों के ट्रांसफर को लेकर परिवारों में विवाद बढ़ रहे हैं. भाइयों और परिजनों में झगड़े के मामले सामने आए.

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ग्वालियर-चंबल में बंदूक बनी रिश्तों की दुश्मन, लाइसेंस को लेकर बढ़े विवाद

Gwalior Gun Culture Arms License Transfer: ग्वालियर-चंबल अंचल में बंदूक सिर्फ सुरक्षा का साधन नहीं, बल्कि वर्षों से सामाजिक प्रतिष्ठा और परंपरा का प्रतीक रही है. लेकिन अब यही बंदूकें परिवारों के बिखराव की वजह बनती जा रही हैं. पिता या पति की मौत के बाद लाइसेंसी हथियारों पर कब्जे और ट्रांसफर को लेकर भाइयों, बेटों और अन्य परिजनों के बीच विवाद बढ़ते जा रहे हैं. ग्वालियर समेत पूरे अंचल के कलेक्टर कार्यालयों की आर्म शाखा में हर महीने ऐसे कई आवेदन पहुंच रहे हैं, जहां वारिस बंदूक अपने नाम कराने की कोशिश में आपसी टकराव तक पहुंच रहे हैं. कई मामलों में तो परिवार कोर्ट, पुलिस और प्रशासन के चक्कर काट रहे हैं. कानून की जटिलताओं और स्पष्ट नीति के अभाव ने इन विवादों को और उलझा दिया है.

ग्वालियर-चंबल और बंदूक की पुरानी परंपरा

ग्वालियर-चंबल अंचल में बंदूक लंबे समय से रुतबे, सुरक्षा और परंपरा का हिस्सा रही है. ग्रामीण इलाकों से लेकर शहरों तक लाइसेंसी बंदूक रखना सामाजिक प्रतिष्ठा से भी जोड़कर देखा जाता रहा है. इसी वजह से यहां बड़ी संख्या में लोगों के पास वैध हथियार लाइसेंस हैं.

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Gwalior Gun Culture: बंदूकों का जमावड़ा

अब परिवारों में बन रही विवाद की वजह

समस्या तब शुरू होती है जब लाइसेंसधारी की मौत हो जाती है. इसके बाद परिवार के कई सदस्य बंदूक और लाइसेंस पर दावा ठोक देते हैं. कहीं भाई-भाई आमने-सामने हैं तो कहीं बेटियों और बेटों में विवाद बढ़ रहा है. स्थिति ऐसी बन रही है कि बंदूक रिश्तों से बड़ी होती जा रही है.

आर्म शाखा में पहुंच रहे विवादित आवेदन

ग्वालियर सहित पूरे चंबल क्षेत्र के कलेक्टर कार्यालयों में हर महीने कई आवेदन पहुंच रहे हैं. इनमें परिजन मृतक के हथियार लाइसेंस को अपने नाम ट्रांसफर कराने की मांग कर रहे हैं. लेकिन जैसे ही एक से अधिक वारिस सामने आते हैं, मामला कानूनी विवाद में बदल जाता है.

“सुरक्षा और रोजगार” का तर्क

ग्वालियर निवासी अमजद खान का मामला इसका उदाहरण है. उनके पिता को सुरक्षा कारणों से लाइसेंसी बंदूक मिली थी. पिता के निधन के बाद अमजद चाहते हैं कि लाइसेंस उनके नाम ट्रांसफर हो जाए. उनका कहना है कि मौजूदा हालात में परिवार की सुरक्षा जरूरी है और हथियार से रोजगार के अवसर भी जुड़े होते हैं. लेकिन परिवार की एनओसी न मिलने के कारण मामला अटका हुआ है.

34 हजार लाइसेंस, लेकिन स्पष्ट नीति नहीं

ग्वालियर जिले में फिलहाल नए हथियार लाइसेंस जारी नहीं किए जा रहे हैं. लेकिन पुराने करीब 34 हजार लाइसेंस सक्रिय हैं. लाइसेंसधारी की मृत्यु के बाद हर महीने 2 से 3 आवेदन ऐसे आते हैं, जिनमें वारिस हथियार अपने नाम कराना चाहते हैं. हालांकि ट्रांसफर की प्रक्रिया विवादों के कारण अक्सर अधूरी रह जाती है.

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Gwalior Gun Culture: बंदूकों का शौक

कानून बना सबसे बड़ी अड़चन

आर्म्स एक्ट और गृह मंत्रालय की गाइडलाइन के अनुसार हथियार लाइसेंस व्यक्तिगत होता है. यानी किसी व्यक्ति की मृत्यु के बाद उसका लाइसेंस स्वतः परिवार के सदस्य को ट्रांसफर नहीं किया जा सकता. यदि एक से ज्यादा वारिस हों तो प्रशासन के सामने यह तय करना मुश्किल हो जाता है कि हथियार किसे दिया जाए.
यहीं से विवाद शुरू होता है.

प्रशासन भी असमंजस में

ग्वालियर के एडीएम सीबी साथ का कहना है कि यदि विवाद न हो तो सात दिन के अंदर ट्रांसफर प्रक्रिया पूरी की जा सकती है. लेकिन कई मामलों में परिवार के सदस्य खुद शिकायतें करने लगते हैं, जिसके चलते लाइसेंस निरस्तीकरण की प्रक्रिया शुरू करनी पड़ती है. इसी कारण अधिकांश मामले लंबे समय तक लंबित बने रहते हैं.

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बेचैरा गांव का चर्चित मामला

पनिहार थाना क्षेत्र के बेचैरा गांव में हाल ही में ऐसा ही विवाद सामने आया. एक लाइसेंसधारी की दो पत्नियां थीं. मौत के बाद बंदूक का लाइसेंस एक पत्नी के नाम ट्रांसफर कर दिया गया. लेकिन दूसरी पत्नी यशोदा बाई ने इसकी शिकायत कर दी. शिकायत के बाद प्रशासन ने लाइसेंस ही निरस्त कर दिया.

चुनाव के बाद बढ़ा भाइयों का विवाद

ग्वालियर के हजीरा क्षेत्र में बंटी राजपूत और उसके भाई के बीच भी हथियार को लेकर विवाद चल रहा है. उनके पिता ने लोकसभा चुनाव के दौरान अपनी रायफल थाने में जमा कराई थी. लेकिन चुनाव के बाद रायफल वापस लेने से पहले ही उनकी मौत हो गई. अब दोनों भाई बंदूक पर अपना हक जता रहे हैं और पुलिस से अलग-अलग आवेदन दे रहे हैं. इस विवाद ने परिवार के रिश्तों में दूरी पैदा कर दी है.

दतिया में 6 भाइयों में रार

दतिया जिले में सुग्रीव सिंह की मौत के बाद उनकी लाइसेंसी बंदूक को लेकर छह भाइयों में विवाद खड़ा हो गया. बताया जा रहा है कि एक भाई ने बंदूक अपने कब्जे में रख ली, जबकि बाकी भाई भी उस पर दावा कर रहे हैं. मामला इतना बढ़ गया कि परिवार में बोलचाल तक बंद हो गई.

इंदरगढ़ में भाइयों के बीच तनाव

इंदरगढ़ निवासी जगदीश की मौत के बाद उनकी 12 बोर की दुनाली बंदूक को लेकर दोनों बेटों के बीच विवाद चल रहा है. आरोप है कि बड़ा भाई जबरन बंदूक ले गया और छोटे भाई को धमकाया भी गया. लाइसेंस ट्रांसफर न होने के बावजूद हथियार कब्जे में लेने को लेकर तनाव बना हुआ है.

पुलिस और प्रशासन की मुश्किलें बढ़ीं

इन मामलों ने पुलिस और प्रशासन दोनों की परेशानी बढ़ा दी है. एक ओर परिवार सुरक्षा और परंपरा का हवाला देते हैं, वहीं दूसरी ओर कानूनी प्रक्रिया बेहद सख्त है. स्पष्ट नीति न होने के कारण कई आवेदन महीनों तक लंबित पड़े रहते हैं.

सुरक्षा का साधन या प्रतिष्ठा की लड़ाई?

कई मामलों में हथियार सुरक्षा से ज्यादा प्रतिष्ठा और नियंत्रण का प्रतीक बन चुके हैं. यही कारण है कि परिवार के सदस्य बंदूक छोड़ने को तैयार नहीं होते. कुछ लोग इसे रोजगार और निजी सुरक्षा से जोड़ते हैं, जबकि कई मामलों में यह भावनात्मक जुड़ाव का विषय भी बन जाता है.

रिश्तों पर भारी पड़ रही बंदूक

ग्वालियर-चंबल क्षेत्र में अब बंदूकें सुरक्षा से ज्यादा विवाद का कारण बनती दिखाई दे रही हैं. ऐसे कई परिवार हैं जहां वर्षों पुराने रिश्ते केवल एक लाइसेंसी हथियार के कारण टूटने की कगार पर पहुंच गए हैं.

ये हैं बड़े सवाल

अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या प्रशासन को हथियार ट्रांसफर को लेकर स्पष्ट नीति बनानी चाहिए? और क्या परिवारों को भी बंदूक से ज्यादा रिश्तों को महत्व देना चाहिए? फिलहाल ग्वालियर-चंबल में बंदूकें सिर्फ हथियार नहीं, बल्कि परिवारों के बीच बढ़ते संघर्ष की कहानी बन चुकी हैं.

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