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पन्ना की तरह MP के इस जिले में भी हीरों का भंडार, 22 लाख कैरेट से अधिक का अनुमान; खनन के लिए मुंबई में मीटिंग

MP सरकार 13 अगस्त को मुंबई में "डायमंड माइनिंग कनेक्ट मीट" आयोजित करेगी. इसमें देश-विदेश की हीरा और खन कंपनियों को बुलाया गया है. मीट में बक्सवाहा में खन की संभावनाओं, निवेश और जरूरी अनुमतियों पर चर्चा होगी.

पन्ना की तरह MP के इस जिले में भी हीरों का भंडार, 22 लाख कैरेट से अधिक का अनुमान; खनन के लिए मुंबई में मीटिंग
पन्ना की तरह बक्सवाहा में भी है हीरे का भंडार.

मध्य प्रदेश का पन्ना जिला हीरों के लिए दुनियाभर में पहचान रखता है. वहीं, पड़ोसी जिले छतरपुर का बक्सवाहा क्षेत्र भी हीरों की खान माना जाता है. करीब दो दशक पहले खोजे गए बक्सवाहा के हीरा भंडार को लेकर राज्य सरकार एक बार फिर सक्रिय हो गई है. सरकार बंद पड़ी परियोजना को नए निवेशकों के जरिए आगे बढ़ाने की तैयारी में है.

मध्य प्रदेश सरकार की ओर से 13 अगस्त को मुंबई में डायमंड माइनिंग कनेक्ट मीट आयोजित की जाएगी. इसमें हीरा और खनन क्षेत्र से जुड़ी देश-विदेश की प्रमुख कंपनियों और निवेशकों को आमंत्रित किया गया है. बैठक में बक्सवाहा में हीरा खनन की संभावनाओं, निवेश और आवश्यक अनुमतियों पर चर्चा होने की संभावना है.

22 लाख कैरेट से अधिक हीरे

बक्सवाहा में हीरे के भंडार को लेकर अलग-अलग आकलन सामने आए हैं. यहां 22 लाख कैरेट से अधिक हीरों का अनुमान बताया गया है, जबकि कुछ पुराने आकलनों में संभावित संसाधन इससे कहीं अधिक बताए गए हैं. इसी वजह से परियोजना को प्रदेश के लिए बड़ा खनिज और निवेश अवसर माना जा रहा है.

2002-05 के बीच हुई थी हीरों की खोज

बक्सवाहा क्षेत्र में वर्ष 2000 से 2005 के बीच ऑस्ट्रेलियाई कंपनी रियो टिंटो ने हीरों की खोज की थी. क्षेत्र में किम्बरलाइट के संकेत मिलने के बाद हीरों की मौजूदगी की पुष्टि हुई थी. हालांकि, पर्यावरणीय मंजूरियों और अन्य कानूनी प्रक्रियाओं के चलते परियोजना आगे नहीं बढ़ सकी. पूर्व में करीब 382 हेक्टेयर वन क्षेत्र से जुड़ी मंजूरियां भी बड़ी चुनौती रही हैं.

नए निवेशकों की तलाश

रियो टिंटो और बाद में एस्सेल माइनिंग के परियोजना से पीछे हटने के बाद अब सरकार नए निवेशकों की तलाश कर रही है. डायमंड माइनिंग कनेक्ट मीट में डी बीयर्स, वेदांता और एनएमडीसी जैसी कंपनियों को भी आमंत्रित किए जाने की जानकारी है.

हालांकि, बक्सवाहा में खनन के साथ पर्यावरण और वन संरक्षण सबसे बड़ी चुनौती होगी. बड़ी संख्या में पेड़ों और जैव विविधता पर संभावित प्रभाव को लेकर सवाल उठते रहे हैं. ऐसे में सरकार के सामने निवेश और खनिज संपदा के दोहन के साथ पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन बनाने की चुनौती होगी.

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