Chaitra Navratri: जहां 12 महीने खिलता है नीम… तालाब का पानी नहीं होता खराब! जानिए शक्तिनगर स्थित ज्वालामुखी मंदिर की कहानी

Singrauli Jwalamukhi Temple: शक्ति स्वरूपा मां भगवती के जीभ के अग्रभाग का छोटा सा हिस्सा सिंगरौली के रानीबारी नामक गांव में गिरा था, जो बाद में चलकर ज्वालामुखी मंदिर के नाम से प्रसिद्ध हुआ.

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 Shaktinagar Jwalamukhi Temple: मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश की सीमा रेखा पर  स्थित शक्तिनगर में ज्वालामुखी मंदिर का इतिहास केवल धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं है, बल्कि यह लोककथाओं, रहस्यमयी घटनाओं और पीढ़ियों से चली आ रही मान्यताओं से जुड़ा हुआ है. यह मंदिर आज भले ही हजारों श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र हो, लेकिन इसकी शुरुआत एक बेहद साधारण और चमत्कारिक घटना से मानी जाती है.

कैसे हुई मंदिर की स्थापना?

NDTV से बातचीत करते हुए ज्वालादेवी शक्तिपीठ के प्रधान पुरोहित श्लोकी मिश्रा बताते है कि शक्ति स्वरूपा मां भगवती के जीभ के अग्रभाग का छोटा सा हिस्सा सिंगरौली के रानीबारी नामक गांव में गिरा था, जो बाद में चलकर ज्वालामुखी मंदिर के नाम से प्रसिद्ध हुआ. पुजारियों ने पौराणिक कथाओं का जिक्र करते हुए बताया कि श्रृंगी ऋषि की तपोस्थली सिंगरौली राज्य के कुंवर उदित नारायण सिंह गहरवार को मां ज्वाला देवी ने स्वप्न दिया था.

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राजपूतों के सुझाव से मां ज्वाला देवी की स्थापना

सपने में देवी ने कहा कि हे राजन तुम्हारे राज्य की राजधानी गहरवार समीप रानी बारी गांव में नीम और बेल के जंगल में मेरी प्रतिभा पड़ी है. इसकी तुम आराधना करो, तुम्हारे राज्य में सुख शांति और समृद्धि होगी. तुम्हारे राज्य का यश पूरे विश्व में फैलेगा। प्रेरणा स्वरूप राजा ने खोज कराया और प्रतिमा को प्राप्त किया राजा प्रतिमा को लेकर अपने राजधानी की ओर जाना चाहते थे, काफी प्रयास के बाद राजा प्रतिमा को ले जाने में असफल रहे. तब राजपूतों के सुझाव से मां ज्वाला देवी की स्थापना कराई गई.

चैत्र शुक्ल पक्ष रामनवमी के दिन मंदिर का जीर्णोद्धार करते हुए मां की प्रतिमा को स्थापित कर विधि-विधान से पूजा किया. काशी के विद्वान पंडित तीर्थ पुरोहित गंगाधर मिश्र की नियुक्ति मठपति के रूप में किया. तभी से प्रति वर्ष चैत्र रामनवमी में एक माह का विशाल मेला के साथ चैत्र व शारदीय नवरात्र में भक्तों का तांता लगता है.

तालाब में नहाने से होता है इलाज

मंदिर के प्रधान पुजारी श्लोकी मिश्रा बताते है कि इस मंदिर परिसर में एक नीम का पेड़ है, जो 12 महीने यानी जनवरी से लेकर दिसंबर तक उस पेड़ में फूल देखने को मिलता है. इसी मंदिर के पास एक तालाब भी है जिसका पानी गंगा जल के समान है, अथार्त उसमें कभी कीड़ा नहीं पड़ता है. हमेशा एक जैसे ही स्वाद रहता है. मान्यता है कि इस तालाब के जल से कई असाध्य रोगों का इलाज होता है। जो किसी रोग से ग्रसित हो और इस तालाब के पानी मे स्नान करता है उसके रोग निसंदेह मिट जाते है.

सिंगरौली का ज्वालामुखी मंदिर इतिहास, आस्था और रहस्य का अनोखा संगम है. इसकी स्थापना से जुड़ी कहानियां भले ही लोककथाओं पर आधारित हों, लेकिन श्रद्धालुओं के लिए यह सच्चाई से कम नहीं. यही वजह है कि यह मंदिर आज भी हजारों लोगों की आस्था का केंद्र बना हुआ है, जहां इतिहास केवल किताबों में नहीं, बल्कि लोगों के विश्वास में जीवित है.

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