Dhoti Kurta Cricket Tournament: भोपाल के शिवाजी नगर स्थित अंकुर खेल मैदान पर इन दिनों क्रिकेट सिर्फ एक खेल नहीं, बल्कि संस्कृति का जीवंत उत्सव बन गया है. मैदान पर खिलाड़ियों की पारंपरिक जर्सी की जगह धोती-कुर्ता दिखाई दे रहा है और दर्शकों के कानों में हिंदी या अंग्रेज़ी नहीं, बल्कि देववाणी संस्कृत की गूंज सुनाई दे रही है. क्रिकेट का यह अनोखा और आकर्षक स्वरूप हर किसी को अपनी ओर खींच रहा है.
मैदान पर उतरी वैदिक परंपरा
राजधानी के इस मैदान पर महर्षि मैत्री मैच शृंखला-6 का अनूठा आयोजन चल रहा है, जो 5 से 9 जनवरी तक जारी रहेगा. इस विशेष टूर्नामेंट का जिम्मा वैदिक ब्राह्मण युवा खेल कल्याण समिति ने संभाला है, जिसे परशुराम कल्याण बोर्ड का भी सहयोग प्राप्त है. बोर्ड के अध्यक्ष विष्णु राजोरिया बताते हैं कि प्रदेशभर से आई 27 टीमें इस प्रतियोगिता में अपना दमखम दिखा रही हैं. यह आयोजन अब अपने छठे वर्ष में प्रवेश कर चुका है और हर साल इसकी लोकप्रियता नई ऊंचाइयों को छू रही है.
Dhoti Kurta Cricket Tournament: भोपाल में गुरुकुल के बच्चों का क्रिकेट टूर्नामेंट आयोजित किया गया है. खासियत ये है कि इसमें खिलाड़ी धोती-कुर्ते में मैदान में उतरे हैं और कमेंट्री संस्कृत में की जा रही है.
जब संस्कृत में गूंजी क्रिकेट की शब्दावली
इस टूर्नामेंट की एक बड़ी खासियत इसकी भाषा है. मैच के दौरान क्रिकेट की पूरी शब्दावली संस्कृत में तब्दील हो गई है. यहां पिच को 'क्षिप्या', गेंद को 'कन्दुकम्', बैट को 'वल्लकः' और रन को 'धावनम्' कहा जा रहा है. जैसे ही कोई खिलाड़ी बाउंड्री लगाता है, तो मैदान 'चतुष्कम्' और 'षठकम्' की घोषणा से गूंज उठता है. अंपायर जिन्हें यहां 'निर्णायक' कहा जा रहा है, वे भी अपने फैसले और संवाद संस्कृत में ही कर रहे हैं.
त्रिपुंड धारी खिलाड़ी और आध्यात्मिक पुरस्कार
मैदान का दृश्य किसी गुरुकुल जैसा लगता है क्योंकि खिलाड़ी धोती-कुर्ता पहनकर और मस्तक पर त्रिपुंड व तिलक लगाकर मैदान में उतर रहे हैं. खेल के अंत में मिलने वाले पुरस्कार भी उतने ही खास हैं. मैन ऑफ द मैच और मैन ऑफ द सीरीज बनने वाले खिलाड़ियों को श्रीमद्भगवद् गीता और श्रीरामचरितमानस भेंट की जा रही है. इस बार विजेता टीम को सम्मानित करने के लिए बागेश्वरधाम के पीठाधीश्वर पं. धीरेंद्र शास्त्री स्वयं मौजूद रह रहे हैं.
मध्यप्रदेश की नई सांस्कृतिक पहचान
आयोजकों का मानना है कि इस तरह के आयोजन पहले केवल काशी की गलियों में देखने को मिलते थे,लेकिन अब मध्यप्रदेश में भी यह अपनी अलग पहचान बना रहा है. समिति का उद्देश्य खेल के माध्यम से भारतीय संस्कृति और संस्कृत भाषा को जन-जन तक पहुंचाना है.आयोजकों की मान्यता है कि भगवान श्रीकृष्ण भी 'कन्दुक क्रीड़ा' (गेंद का खेल) खेलते थे और उसी पौराणिक परंपरा की एक जीवंत झलक अब भोपाल के आधुनिक मैदान पर दिखाई दे रही है.
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