बड़वानी जिले में इस बार मिर्च की खेती किसानों के लिए कमाई नहीं, बल्कि चिंता का कारण बनती जा रही है. जिस फसल को किसान कपास से भी ज्यादा फायदे का सौदा मानकर बड़े पैमाने पर लगाते हैं, उसी मिर्च को अब खेतों से उखाड़कर बाहर फेंकना पड़ रहा है. वजह है वायरस जनित बीमारी, जिसने मिर्च के पौधों को बुरी तरह प्रभावित कर दिया है. पत्तियां सिकुड़ रही हैं, फल छोटे रह जा रहे हैं और उत्पादन लगातार घटता जा रहा है.
लाखों रुपये खर्च करने के बाद फसल बर्बाद होती देख किसानों की उम्मीदें भी टूट रही हैं. जिले के कई गांवों में हालात ऐसे हैं कि किसान खड़ी फसल पर रोटावेटर चलाकर अगली फसल की तैयारी करने लगे हैं. प्रभावित किसानों ने प्रशासन से सर्वे कराकर मुआवजा देने की मांग की है.
कई इलाकों में फैला वायरस का असर
मध्य प्रदेश के बड़वानी जिले के राजपुर, सजवानी, रहगुन, बालकुवा, तलवाड़ा और मंडवाड़ा समेत कई क्षेत्रों में मिर्च की फसल पर वायरस जनित बीमारी का असर देखने को मिल रहा है. किसानों का कहना है कि खेतों में लगे पौधों की पत्तियां सिकुड़ रही हैं और पौधों की बढ़वार भी प्रभावित हो रही है. बीमारी का असर बढ़ने के साथ ही फसल की गुणवत्ता और उत्पादन दोनों पर असर पड़ा है.
आकार में छोटी रह गई मिर्च, घटा उत्पादन
वायरस की वजह से मिर्च के फल सामान्य आकार तक विकसित नहीं हो पा रहे हैं. कई खेतों में मिर्च का आकार काफी छोटा रह गया है, जिससे बाजार में अच्छे दाम नहीं मिल रहे. किसानों का कहना है कि उत्पादन पहले ही कम हो गया है, ऊपर से मंडी में अपेक्षित कीमत नहीं मिलने से आर्थिक नुकसान और बढ़ गया है.
मुनाफे की जगह घाटे का सौदा बनी खेती
इस क्षेत्र में किसान मिर्च की खेती को कपास की तुलना में अधिक लाभदायक मानते हैं. यही वजह है कि हर साल बड़ी संख्या में किसान इसकी खेती करते हैं. लेकिन इस वर्ष वायरस के प्रकोप ने गणित पूरी तरह बदल दिया है. जिस फसल से बेहतर आमदनी की उम्मीद थी, वही अब किसानों के लिए घाटे का कारण बन रही है.
खेतों से उखाड़े जा रहे मिर्च के पौधे
बीमारी के बढ़ते असर के कारण कई किसान मिर्च की खड़ी फसल को उखाड़ने के लिए मजबूर हो गए हैं. कुछ किसानों ने पूरे खेत खाली कर दिए हैं, जबकि कई जगहों पर रोटावेटर चलाकर फसल नष्ट कर दी है. किसानों का कहना है कि जब उत्पादन मिलने की संभावना ही नहीं रह जाती, तब फसल को खेत में बनाए रखना और अधिक नुकसानदेह साबित होता है.
लाखों रुपये की लागत पर फिरा पानी
किसानों के मुताबिक करीब ढाई एकड़ क्षेत्र में मिर्च की खेती तैयार करने में दो से ढाई लाख रुपये तक की लागत आती है. बीज, खाद, दवाइयों और सिंचाई पर भारी खर्च किया जाता है. इसके बावजूद फसल खराब होने से किसानों को बड़ा आर्थिक झटका लग रहा है. कई किसानों का कहना है कि उन्होंने कर्ज लेकर खेती की थी, जिससे उनकी परेशानी और बढ़ गई है.
वायरस-रोधी बीज पर भी किसानों के सवाल
प्रभावित किसानों का कहना है कि उन्होंने ऐसे बीज खरीदे थे जिन्हें वायरस-रोधी बताया था. इसके बावजूद खेतों में बीमारी दिखाई दे रही है. किसानों का मानना है कि इसके पीछे बीज की गुणवत्ता और मौसम दोनों कारण हो सकते हैं. हालांकि बीमारी की वास्तविक वजह क्या है, इसका स्पष्ट पता कृषि विभाग की जांच और सर्वे के बाद ही चल सकेगा.
सैकड़ों किसानों पर पड़ा असर
राजपुर क्षेत्र में करीब 100 से 200 किसानों के प्रभावित होने की बात सामने आ रही है. वहीं किसानों और स्थानीय संगठनों का दावा है कि पूरी तहसील में प्रभावित किसानों की संख्या इससे कहीं अधिक हो सकती है. लगातार सामने आ रहे मामलों ने किसानों की चिंता बढ़ा दी है.
20 हजार हेक्टेयर में होती है मिर्च की खेती
बड़वानी जिले में लगभग 20 हजार हेक्टेयर क्षेत्र में मिर्च की खेती की जाती है. ऐसे में यदि वायरस का प्रकोप बड़े इलाके में फैला हुआ है, तो नुकसान का दायरा भी काफी बड़ा हो सकता है. इसका असर सिर्फ किसानों की आय पर ही नहीं, बल्कि स्थानीय कृषि अर्थव्यवस्था पर भी पड़ सकता है.
सर्वे और मुआवजे की मांग
भारतीय किसान संघ समेत प्रभावित किसानों ने प्रशासन और कृषि विभाग से जल्द सर्वे कराने की मांग की है. किसानों का कहना है कि नुकसान का सही आकलन किया जाए और प्रभावित किसानों को राहत एवं मुआवजा दिया जाए, ताकि उन्हें हुए आर्थिक नुकसान की कुछ भरपाई हो सके.