Holi Celebration 2026 News: कभी लाल आतंक के साए में जीवन बिताने वाले आत्मसमर्पित नक्सली अब पुनर्वास की नई राह पर आगे बढ़ रहे हैं. जिस जीवन में कभी उत्सव, खुशियां और रंगों के लिए कोई जगह नहीं थी, आज वहीं लोग होली जैसे रंगों के त्योहार में पूरी तरह सराबोर दिखाई दे रहे हैं.
जब NDTV की टीम इन पुनर्वासित नक्सलियों के बीच होली का त्योहार मनाने पहुंची, तो माहौल पूरी तरह रंगों और उत्साह से भरा हुआ था. रंगों से सजी इस दुनिया को देखकर वे बेहद उत्साहित हो उठे और खुद भी इस उत्सव का हिस्सा बनकर रंगों में रंग गए. उनके चेहरों पर पहली बार खुलकर मुस्कुराहट और जीवन के प्रति एक नई उम्मीद दिखाई दी.
संगठन में त्योहारों से था पूरी तरह दूरी
पुनर्वासित नक्सलियों का कहना है कि संगठन के भीतर रहते हुए उन्हें कभी त्योहारों का एहसास ही नहीं होता था. बचपन में जब वे छोटे थे, तब कभी-कभार परिवार के साथ होली मनाने का मौका मिला था, लेकिन संगठन में शामिल होने के बाद त्योहार मनाने की पूरी तरह मनाही थी. उनके मुताबिक, संगठन के नियम इतने कठोर थे कि होली, दिवाली या किसी भी पारंपरिक त्योहार को मनाने की अनुमति नहीं होती थी. ऐसे में साल दर साल त्योहार बिना किसी उत्सव के ही गुजर जाते थे. लेकिन आज जब वे मुख्यधारा में लौट आए हैं और बाहरी दुनिया के रंगों से परिचित हो रहे हैं, तो खुद को इन खुशियों से दूर रखना उनके लिए संभव नहीं रहा.
बेहतर जीवन के साथ लौटी खुशियां
मुख्यधारा में लौटने के बाद उनका जीवन पूरी तरह बदल चुका है. अब वे सुरक्षित और बेहतर जीवन जीते हुए अपने परिवार और समाज के साथ त्योहारों का आनंद ले रहे हैं. पुनर्वासित नक्सलियों ने उत्तर बस्तर क्षेत्र में अब भी सक्रिय नक्सलियों से अपील की है कि वे भी हिंसा का रास्ता छोड़कर समाज की मुख्यधारा में लौट आएं. उनका कहना है कि मुख्यधारा में लौटने के बाद जीवन में जो सुकून और खुशियां मिलती हैं, वह जंगलों और हिंसा के रास्ते में कभी नहीं मिल सकती.
नारायणपुर के कुतुल में होली की खास रौनक
नारायणपुर जिले का कुतुल क्षेत्र, जिसे कभी नक्सलियों की राजधानी कहा जाता था, आज पूरी तरह बदली हुई तस्वीर पेश कर रहा है. यहां इस बार होली का त्योहार खास उत्साह के साथ मनाया जा रहा है. गांव के बच्चे पहली बार घर-घर जाकर होली खेल रहे हैं और रंगों के साथ खुशियां बांट रहे हैं. जिस इलाके में कभी खून-खराबे और हिंसा की कहानियां सुनाई देती थी, वहां अब हंसी, रंग और त्योहार की खुशबू फैल रही है.
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एक समय ऐसा था जब इस इलाके में बारूद की गंध इतनी गहरी थी कि अबूझमाड़ की मिट्टी की असली खुशबू भी दब जाती थी. लेकिन आज वही धरती रंगों और त्योहारों की रौनक से महक रही है, मानो इस क्षेत्र ने भी एक नई शुरुआत कर दी हो.
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