आजादी के 75 वर्ष बाद भी चरखे से बनाई जा रही साड़ियां, परंपरा जिंदबाद, मगर कारीगरों की स्थिति नाजुक

आजादी के 75 साल बाद भी जहां आधुनिकता ने अपना रूप ले लिया है वही इस गांव के लोग उसी पुरानी परंपरा को बनाए रखे हैं

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बालाघाट जिला मुख्यालय से महज 20 किलोमीटर दूर ग्राम मेहंदीवाडा में आज भी चरखे के द्वारा साड़ियां बनाई जाती हैं. इस कार्य में लगे कुछ परिवार जिनका पैतृक कार्य साड़ी बनाना ही है. वह चरखे के द्वारा हैंडलूम साड़ियां बनाते हैं जो चंदेरी नाम से जानी जाती है.

आजादी के 75 साल बाद भी जहां आधुनिकता ने अपना रूप ले लिया है वही इस गांव के लोग उसी पुरानी परंपरा को बनाए रखे हैं. जिस तरह इनकी आर्थिक हालत पूर्व में थी वह आज भी यथावत है. 2-3  दिन  में बमुश्किल एक साड़ी बनाना इनका मूल मकसद है और यही इनके उधर पोषण का जरिया है.

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आपको बता दें कि इन कारीगरों की आज भी माली हालत  20 वर्ष पूर्व जैसी ही है इनके पीढ़ी दर पीढ़ी आज यही काम करती आ रही है किंतु इनकी माली हालत में कोई सुधार नहीं हुआ है. करीब 2 से 3 दिनों में एक साड़ी बनाकर यह अपना उधर पोषण करते हैं. जानकारी देते हुए कारीगरों ने बताया की कड़ी मेहनत के बाद और धागों की बढ़ती कीमतों के आगे वह नतमस्तक हो गए हैं एवं खाने खाने को मजबूर है.

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