एक दिन नहीं, एक सोच: राष्ट्रीय बालिका दिवस और ज़मीनी हकीकत

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मानसी झा

National Girl Child Day: राष्ट्रीय बालिका दिवस (Rashtriya Balika Diwas) हर साल 24 जनवरी को मनाया जाता है, लेकिन सवाल यह है कि क्या यह दिन केवल प्रतीक बनकर रह गया है, या सच में हमारी सोच और नीतियों को दिशा दे रहा है? भारत में बालिकाओं और महिलाओं के लिए बनी नीतियाँ यूँ ही नहीं आईं वे उस सामाजिक असमानता की उपज हैं, जो दशकों से हमारे समाज में गहराई से जमी हुई है. इस दिन को मनाने का उद्देश्य बालिकाओं के अधिकारों को बढ़ावा देना और लैंगिक भेदभाव को खत्म करना है. इसके अलावा शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे मुद्दों पर ध्यान केंद्रित करना भी है. इसका उद्देश्य बालिकाओं को महत्व देने वाला एक सकारात्मक वातावरण के निर्माण में पूरे राष्ट्र को शामिल करना है. इसके साथ ही यह दिवस देश भर में बालिकाओं को सशक्त बनाने और उनके लिए समाज में सुरक्षित माहौल बनाने की ज़रूरत की याद दिलाता है.

“बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ”, सुकन्या समृद्धि योजना, POCSO Act, बाल विवाह निषेध कानून, निर्भया फंड और राज्यों की योजनाएँ जैसे लाड़ली बहना योजना ये सभी इस बात का प्रमाण हैं कि सरकार ने यह स्वीकार किया है कि बाज़ार और समाज अपने आप समानता नहीं दे पाए.

इन नीतियों की ज़रूरत इसलिए पड़ी क्योंकि लड़कियों की शिक्षा दर कम थी, स्वास्थ्य संकेतक कमजोर थे, बाल विवाह और लैंगिक हिंसा जैसी समस्याएँ आज भी मौजूद थीं. नीति दरअसल एक “हस्तक्षेप” है जब समाज असफल हो जाए, तब राज्य को आगे आना पड़ता है.

लेकिन भारत एकसमान नहीं है. केरल इसका सबसे बड़ा उदाहरण है. केरल में महिला साक्षरता दर, स्वास्थ्य सुविधाएँ, मातृ मृत्यु दर और लैंगिक सूचकांक देश के कई राज्यों से बेहतर हैं.

वहाँ लड़कियों की शिक्षा को सामाजिक स्वीकृति मिली, स्वास्थ्य सेवाएँ मजबूत रहीं और महिलाओं की सार्वजनिक भागीदारी अपेक्षाकृत अधिक रही. नतीजा यह हुआ कि नीतियों के साथ-साथ सामाजिक सोच भी बदली.

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इसके उलट, भारत के कई अन्य हिस्सों में आज भी बेटियों को “सुरक्षा” के नाम पर सीमित किया जाता है, शिक्षा को बोझ समझा जाता है और आर्थिक निर्भरता को सामान्य माना जाता है. यहाँ नीतियाँ तो हैं, लेकिन ज़मीनी क्रियान्वयन और सामाजिक स्वीकार्यता कमजोर है. यही कारण है कि एक ही देश में महिला सशक्तिकरण की तस्वीर दो अलग-अलग भारत दिखाती है.

राष्ट्रीय बालिका दिवस पर यह स्वीकार करना ज़रूरी है कि नीतियाँ ज़रूरी हैं, लेकिन पर्याप्त नहीं. असली बदलाव तब आएगा जब हम केरल जैसे उदाहरणों से सीखकर शिक्षा, स्वास्थ्य और सम्मान को “योजना” नहीं, बल्कि “सामाजिक मूल्य” बनाएँगे. यह केवल सरकार से सवाल नहीं, बल्कि समाज से भी प्रश्न है क्या हम सच में बेटियों को बराबरी का नागरिक मानने के लिए तैयार हैं? क्योंकि जब तक सोच नहीं बदलेगी, तब तक नीति केवल काग़ज़ पर सशक्तिकरण बनकर रह जाएगी.

मानसी झा : लेखिका, पत्रकारिता की स्टूडेंट हैं.
डिस्क्लेमर : इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के अपने हैं.