Ram Navami 2026: क्या रामनवमी 2026 से पहले श्रीराम के वनवास मार्ग से जुड़े वे ऐतिहासिक और सांस्कृतिक सूत्र सामने आ पाएंगे, जो सदियों से लोकपरंपराओं और ग्रंथों में सुरक्षित हैं? 26 मार्च 2026 को मनाई जाने वाली रामनवमी से पहले एक व्यापक शोध अभियान की शुरुआत की गई है, जिसका उद्देश्य अयोध्या से पंचवटी तक फैले वनवास पथ और उससे जुड़ी नदी-संस्कृति के आयामों का गहन अध्ययन करना है. शोध टीम यह जानने निकली है कि श्रीराम की यात्रा केवल भौगोलिक मार्ग नहीं थी, बल्कि भारतीय सभ्यता, नदियों और समाज के बीच गहरे संबंधों की जीवंत धारा भी थी.
Shri Ram Vanvas Route: इस शोध अभियान का नेतृत्व भारतीय दार्शनिक एवं आध्यात्मिक शोधकर्ता देवऋषि कर रहे हैं. परियोजना का संचालन मध्यप्रदेश सरकार के वीर भारत न्यास के अंतर्गत किया जा रहा है, जबकि शोध कार्य Sanatan Wisdom द्वारा संपादित होगा. उद्देश्य केवल धार्मिक संदर्भों का पुनर्पाठ करना नहीं, बल्कि श्रीराम के वनवास मार्ग को ऐतिहासिक, सांस्कृतिक, सामाजिक और पर्यावरणीय दृष्टि से समझना है.
अयोध्या से श्रृंगवेरपुर तक: नदी और समाज का संबंध
अध्ययन की शुरुआत अयोध्या से होगी, जहां सरयू नदी के तट पर श्रीराम के वनगमन की पृष्ठभूमि को परखा जाएगा. इसके बाद शोध दल श्रृंगवेरपुर पहुंचेगा, जहां गंगा तट पर निषादराज से श्रीराम की भेंट का प्रसंग मिलता है. इस चरण में विशेष रूप से वनवासी समुदायों की सामाजिक संरचना, समरसता और स्थानीय जीवन-पद्धति के ऐतिहासिक संदर्भों को समझने का प्रयास किया जाएगा.
प्रयागराज और आश्रम परंपरा
अगला महत्वपूर्ण पड़ाव प्रयागराज होगा. गंगा और यमुना के संगम क्षेत्र में महर्षि भरद्वाज से श्रीराम की भेंट का उल्लेख मिलता है. यहां आश्रम परंपरा, ज्ञान-संवाद की परंपरा और नदी-संस्कृति के अंतर्संबंधों का अध्ययन किया जाएगा. शोधकर्ता यह भी देखेंगे कि उस समय नदियां केवल जलस्रोत नहीं, बल्कि सामाजिक और बौद्धिक जीवन की धुरी थीं.
चित्रकूट से पंचवटी तक
प्रयागराज से आगे यमुना पार कर यात्रा चित्रकूट पहुंचेगी, जहां मंदाकिनी नदी के तट पर श्रीराम का महत्वपूर्ण निवास स्थल माना जाता है. यहां वनवासी जीवन, प्रकृति के प्रति संवेदनशील आचरण और जनसहभागिता के पहलुओं का परीक्षण किया जाएगा. इसके बाद अध्ययन का विस्तार पंचवटी क्षेत्र तक प्रस्तावित है, जो वर्तमान नासिक से संबंधित है. गोदावरी तट पर स्थित इस क्षेत्र में वनवास के उत्तरार्ध से जुड़े प्रसंगों का ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विश्लेषण किया जाएगा.
वृत्तचित्र श्रृंखला भी बनेगी
परियोजना के अंतर्गत पांच भागों में एक वृत्तचित्र श्रृंखला भी तैयार की जा रही है. इसमें संबंधित स्थलों, नदी-तटीय परंपराओं, आश्रम-संस्कृति और वनवासी जीवन को समाहित किया जाएगा. इसका उद्देश्य रामायणकालीन प्रसंगों को आधुनिक संदर्भ में समझना और युवा पीढ़ी तक प्रमाणिक शोध के आधार पर प्रस्तुत करना है. इस प्रकार यह शोध अभियान श्रीराम के वनवास को केवल धार्मिक कथा के रूप में नहीं, बल्कि भारतीय समाज, प्रकृति और नदी-संस्कृति के गहरे अंतर्संबंध के रूप में देखने का प्रयास है.
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