रायसेन जिले के उदयपुरा में कृष्ण जन्माष्टमी के अगले दिन जब कान्हा बाल रूप में अपनी माता यशोदा की गोद में पालकी में सवार होकर नगर भ्रमण पर निकलते हैं, तो पूरा शहर भक्तिमय हो उठता है. भगवान श्रीकृष्ण की यह अनोखी पालकी यात्रा करीब 500 वर्षों से अनवरत चली आ रही है.
मान्यता है कि भगवान श्रीकृष्ण की पालकी के नीचे से निकलने और उनके चरणों का स्पर्श करने से जीवन के संकट दूर होते हैं और ठाकुर जी की कृपा बनी रहती है. इसी आस्था के चलते पालकी के आगे बढ़ते ही श्रद्धालुओं में इसके नीचे से निकलने की होड़ सी मच जाती है.
बच्चे हों, बुजुर्ग हों या महिलाएं, हर कोई ठाकुर जी के इस अनोखे दरबार में अपनी हाजिरी लगाने को आतुर नजर आता है. ढोल-नगाड़ों, भजन-कीर्तन और नृत्य के बीच निकली इस यात्रा में आस्था का ऐसा सैलाब उमड़ता है कि हर कोई कान्हा के दर्शन को आतुर रहता है.
दरअसल, उदयपुरा स्थित श्रीराम-जानकी बड़े मंदिर से भगवान श्रीकृष्ण विमान रूपी पालकी में विराजमान होकर नगर भ्रमण के लिए निकलते हैं. पालकी में बाल गोपाल के साथ माता यशोदा का स्वरूप भी विराजमान रहता है.
ढोल-नगाड़ों की गूंज और भक्ति का रंग
पालकी यात्रा नगर के प्रमुख मार्गों से होती हुई दशहरा मैदान (लोधीपुरा) पहुंचती है, जहां भगवान श्रीकृष्ण का जल विहार कराया जाता है. यात्रा के रास्ते में चारों ओर भक्ति का रंग नजर आता है. कहीं ढोल-नगाड़ों की गूंज सुनाई देती है, तो कहीं भक्तों की टोलियां श्रीकृष्ण के भजनों पर झूमती नजर आती हैं.
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पालकी यात्रा सांस्कृतिक और आध्यात्मिक पहचान
करीब 500 वर्षों से चली आ रही यह परंपरा सिर्फ एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि उदयपुरा की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक पहचान बन चुकी है. हर साल जन्माष्टमी के दूसरे दिन ठाकुर जी नगर भ्रमण पर निकलते हैं, भक्तों को दर्शन देते हैं और जल विहार करते हैं. इस दौरान श्रद्धालु भगवान श्रीकृष्ण से अपने परिवार के सुख-समृद्धि के साथ-साथ नगर, प्रदेश और देश की खुशहाली की कामना करते हैं.