Opium Coltivation in Madhya Pradesh: रतलाम जिले के ग्राम नौगांव में गोपाल धाकड़ अपनी आधा बीघा अफीम की फसल को बड़ी सावधानी से निहार रहे हैं. यह सिर्फ एक खेती नहीं, बल्कि तीन पीढ़ियों की विरासत है. गोपाल बताते हैं कि अफीम की खेती का लाइसेंस (पट्टा) उनके दादा के समय से है. दादा के बाद पिता ने यह जिम्मेदारी संभाली और अब तीसरी पीढ़ी के रूप में गोपाल धाकड़ इस परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं. उनकी इस साल की फसल लगभग तैयार है.
करीब छह महीने में तैयार होने वाली यह फसल बेहद संवेदनशील और महत्वपूर्ण होती है. गोपाल धाकड़ बताते हैं कि अफीम की खेती (Opium Cultivation) में सामान्य फसलों की तुलना में अधिक देखभाल की जरूरत पड़ती है. कीटों से बचाव के लिए कई प्रकार के कीटनाशकों का उपयोग करना पड़ता है. वहीं, दूसरी ओर चोरों से भी फसल को बचाना एक बड़ी चुनौती है. रात-रात भर खेत की रखवाली करनी पड़ती है, क्योंकि डोडा (अफीम का फल) चोरी होने का खतरा बना रहता है.
नारकोटिक्स विभाग डोडों पर लगाती है चीरा
फसल तैयार होने पर नारकोटिक्स विभाग की टीम गांव पहुंचती है. विभागीय अधिकारी डोडों पर चीर लगाकर अफीम निकालते हैं. गोपाल के अनुसार, आधा बीघा जमीन से लगभग 6 से 7 किलो अफीम निकल जाती है. इसके बदले सरकार की ओर से करीब 20 हजार रुपये का भुगतान किया जाता है.
खसखस किसानों के लिए होता है
इसके अलावा डोडे से निकलने वाला खसखस किसान को दे दिया जाता है, जिसे बाजार में बेचकर वह 40 से 50 हजार रुपये तक कमा लेता है, लेकिन बदलते समय के साथ यह खेती अब घाटे का सौदा बनती जा रही है. गोपाल धाकड़ ने बताया कि बढ़ती लागत, दवाइयों का खर्च, मजदूरी और सुरक्षा के इंतजाम के बाद मुनाफा बहुत सीमित रह जाता है. कई बार तो लागत निकालना भी मुश्किल हो जाता है.
तस्करी को लेकर सताता है डर
सफेद और खूबसूरत फूलों से सजे ये खेत जितने आकर्षक दिखते हैं, उतनी ही गहरी सच्चाई इनके पीछे छिपी है. अफीम की खेती के साथ तस्करी का काला साया भी जुड़ा हुआ है. तस्कर अक्सर खेतों से डोडा चुराकर उसे ऊंचे दामों में दूसरे राज्यों में नशे के कारोबार के लिए भेज देते हैं. यही वजह है कि किसानों को जहां एक ओर फसल की चिंता रहती है, वहीं दूसरी ओर अवैध गतिविधियों से भी दूरी बनाए रखना एक बड़ी जिम्मेदारी होती है.
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