NBT-published Dev Shrimali's Chambal: मध्य प्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार देव श्रीमाली की लिखी पुस्तक 'चंबल-संस्कृति और विरासत' हाल ही में नेशनल बुक ट्रस्ट से प्रकाशित होकर पाठकों के बीच पहुंच चुकी है. यह किताब चंबल अंचल के उन पक्षों पर रोशनी डालती है, जिनकी चर्चा आमतौर पर कम होती रही है. 63 वर्षीय श्रीमाली ने पत्रकारिता के लंबे अनुभव के साथ चंबल को करीब से देखा और समझा है. उनकी पुस्तक का सबसे मजबूत पक्ष यह है कि यह किसी एक विषय की सतही जानकारी नहीं, बल्कि पूरे अंचल का व्यवस्थित दस्तावेज है. किताब की शुरुआत चंबल नदी के प्राकृतिक स्वरुप से होती है, जहां जैव विविधता, दुर्लभ जल जीव, घाटों की संस्कृति और नदी आधारित जीवन शैली का विस्तार से वर्णन मिलता है.
किताब की शुरुआत चंबल नदी के प्राकृतिक स्वरुप से होती है, जहां जैव विविधता, दुर्लभ जल जीव, घाटों की संस्कृति और नदी आधारित जीवन शैली का विस्तार से वर्णन मिलता है. आगे के अध्यायों में यहां की लोक कथाएं, देवी-देवताओं से जुड़ी गाथाएं, पारंपरिक पोशाक, संगीत-नृत्य, मेले, रीति-रिवाज और बोलचाल की जुबान का सजीव चित्रण किया गया है.
सीएम भोपाल में करेंगे विमोचन
किताब का विमोचन 1 दिसंबर शाम 5 बजे विधानसभा परिसर में आयोजित कार्यक्रम में होगा. मध्य प्रदेश के सीएम मोहन यादव, विधानसभा अध्यक्ष नरेंद्र सिंह तोमर और भाजपा प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल इसका लोकार्पण करेंगे. इस अवसर पर चंबल से जुड़े इतिहासकार, साहित्यकार, पत्रकार और कई सामाजिक प्रतिनिधि मौजूद रहेंगे.
देव श्रीमाली ने क्या कुछ कहा?
पुस्तक के लेखक देव श्रीमाली ले कहा कि चंबल का नाम सुनते किसी को स्मरण नहीं आता कि यह नदी राजस्थान, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश का सीमांकन करते हुए इन राज्यों के बड़े हिस्से की लाइफलाइन है. धरती और आबादी, दोनों की प्यास बुझाती है. कोई उल्लेख नहीं करता कि यह इकलौती नदी है, जिसका पानी पारदर्शी है, इसीलिए मेघदूत में कालिदास कहते हैं, इसका अभिवादन लिए बगैर मत निकलना. 'पीला-सोना', यानी सरसों की सबसे अधिक पैदावार चंबल की कोख से ही होती है और यह खयाल भी किसी को नहीं आता कि देश की सीमाओं की रक्षा पर इस अंचल के पचास हजार रणबांकुरे दशाब्दियाँ नहीं शताब्दियों से तैनात रहते चले आ रहे हैं तथा आज भी हैं.
हजारों शहीद जवानों की युवा पत्नियाँ, इस क्षेत्र में गौरव से सिर उठाकर रहती हैं और अपने बच्चों को सिर्फ इसलिए बड़ा करती हैं, ताकि वह भी उनके दिवंगत पति की तरह सेना में भर्ती होकर सीमा पर तैनात होकर भारत माता का मान-अभिमान बढ़ाए. चंबल का नाम आते ही सबके मुँह से निकलता है, दस्यु पैदा करने वाली चंबल !
चंबल में डाकू समस्या स्वाधीनता के पहले से है. राजसत्ता के खिलाफ बगावत खरामा-खरामा बागी से डाकू समस्या में बदल गई. चूँकि, इसके कथानक में खून है, प्रतिशोध है, हिंसा है, खौफ है, दुस्साहस है और सुरक्षा के लिए बीहड़ हैं, लिहाजा ये सदैव मीडिया को मन भाए. चंबल पर सिर्फ डाकू लिखा गया. वही पढ़ाया गया और वही दिखाया भी गया. लेकिन यह चंबल की पूरी तस्वीर नहीं है, बल्कि एक छोटा हिस्सा मात्र है. चंबल अंचल प्रागैतिहासिक काल से समृद्ध रहा. महाभारत काल की कुंती यहीं की थीं और मुस्लिम आक्रांता हों या ब्रितानी हुकूमत, इस अंचल ने सदैव उनकी सत्ता को चुनौती दी.
देश के नागराजाओं द्वारा स्थापित पहला हिंदू राज्य पद्मावत (वर्तमान पवाया) यहीं स्थापित हुआ. चंबल के कर्कश बीहड़ों में भी एक संस्कृति पलती है, जिसमें अनेक रंग हैं. चंबल अंचल आदिकाल से धर्म और अध्यात्म का केंद्र रहा. शैव मंदिरों व मठों और जैन देवालयों की मौजूदगी इसके ठोस साक्ष्य हैं. यही नहीं चंबल में पुरातत्व और पर्यटन के लिए खजाना भरा पड़ा है.
कम लोग जानते हैं कि दिल्ली में बने संसद भवन का वास्तुशिल्प इसी चंबल में विद्यमान मितावली ग्राम के चौंसठ योगिनी मंदिर से लिया गया है. खजुराहो मंदिर श्रृंखला के निर्माण से बहुत पहले इस शैली का स्थापत्य यहाँ के मंदिरों में उपलब्ध है.
अब सवाल यही है कि यह सब किसी को पता क्यों नहीं है? बस इसी का जवाब यह किताब देगी. असल में चंबल पर समन्वित रूप में कोई पुस्तक है ही नहीं, जो यहाँ के इतिहास, राजसत्ताओं, कला, संस्कृति, पुरातत्व, स्वाधीनता संग्राम में अंचल की भूमिका लेकर इसकी विकास यात्रा का ब्यौरा दे सके. इस बात की कमी मुझे बचपन से ही खलती थी. इस कमी को दूर करने के लिए ही मैंने इस पुस्तक 'चंबल संस्कृति और विरासत' को लिखने का निर्णय लिया. मुझे प्रसन्नता हुई, जब मेरे इन विचार को राष्ट्रीय पुस्तक न्यास ने प्रोत्साहित किया और इसके प्रकाशन का भरोसा दिया.
शोध और परिणामों का किया अध्ययन
देवश्री माली ने आगे बताया कि इस पुस्तक को समग्र बनाने के लिए मैंने सैकड़ों पुस्तकें खंगाली, जिनमें अनेक दुर्लभ थीं. अनेक विषय-विशेषज्ञों से भेंट की. कई विश्वविद्यालयों में जाकर इस क्षेत्र पर हुए शोध परिणामों का अध्ययन किया. लगभग तीन वर्षों के ज्ञानार्जन के बाद अब यह पुस्तक आपको सौंपने जा रहा हूँ. इसमें मैंने चंबल घाटी से जुड़ी हर बात को संक्षिप्त में समेटने का प्रयास किया है. इसका मकसद यह है कि केवल इस एक पुस्तक को पढ़कर पाठक चंबल के बारे में थोड़ा-थोड़ा ही सही, लेकिन सब-कुछ जान सके.
इसे पढ़कर लोगों को कई चौंकाने वाले तथ्य मिलेंगे, जो संभवतः पहली बार उद्घाटित होंगे.यह पुस्तक लिखना एक श्रमसाध्य काम था, वह भी अपनी नियमित पत्रकारिता के साथ, लेकिन कभी धीमी तो कभी तीव्र गति से यह चलता ही रहा. इसका पूरा श्रेय मेरे प्रिय लेखक-पत्रकार मित्र श्री प्रमोद भार्गव को ही जाएगा, जो तकरीबन हर रोज, (कभी-कभी तो एक दिन में कई बार भी) न केवल मुझे प्रोत्साहित करते, टोकते, बल्कि अनेक बार तो गुस्सा भी होते. उनका इतना रचनात्मक आग्रहात्मक दबाव न होता तो पता नहीं यह काम कब पूरा होता? होता भी कि नहीं? बहरहाल इसके लिए मैं उनके प्रति कितनी भी कृतज्ञता ज्ञापित करूँ, कम ही है.
इस पुस्तक में मेरी पत्नी श्रीमती ममता श्रीमाली, पुत्र आशीष और देवांग, पुत्री अंजली और पुत्रवधु श्रीमती शिवानी का योगदान दरकिनार नहीं किया जा सकता. इन लोगों ने न केवल सदैव अनुकूल माहौल दिया, बल्कि कार्य की पूर्णता के लिए प्रेरित भी किया. कोरोना काल में जब सब घर में कैद थे तो ये लोग आग्रहपूर्वक दबाव भी बनाते रहे कि मैं इस पुस्तक का काम जल्द पूरा करूं. आज यह पुस्तक देश को सौंपते हुए मैं ऐसा महसूस कर रहा हूँ, मानो मैंने अपनी माँ के वस्त्रों पर जबरन थोपे गए दाग हटाने के प्रयास की शुरुआत की है.
उम्मीद है प्रयास सभी को पसंद आएगा
देव श्रीमाली ने कहा कि यह बात मुझे गर्वित भी कर रही है. हालांकि इस अंचल की सांस्कृतिक, सामाजिक और राजनीतिक विविधता को कुछ पन्नों में समेटना संभव नहीं था, फिर भी मैंने कोशिश की है कि इसको पढ़कर पाठक के दिलो-दिमाग में चंबल का समग्र चित्रण अंकित हो सके, जो अब तक चंबल, यानी डाकू, चंबल, यानी वीहड़ समझता रहा है. हमने इसमें अंचल की जैव विविधता का भी उल्लेख किया है और समस्याओं के कारण एवं संकेतात्मक ही सही निदान ढूँढ़ने के प्रयास भी किए हैं. उम्मीद है मेरा प्रयास सबको पसंद आएगा और देश व समाज के लिए उपयोगी भी साबित होगा. एक बार पुनः इसमें सहयोग करने वाले महानुभावों, उपयोग की गई संदर्भसामग्री के रचयिताओं तथा राष्ट्रीय पुस्तक न्यास के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करता हूं, जिनके कारण मेरी मंशा पुस्तक का आकार ले सकी.
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