दतिया विधानसभा उपचुनाव में इस समय यदि किसी एक नेता के आवास पर सबसे अधिक राजनीतिक गतिविधियां दिखाई दे रही हैं तो वह कांग्रेस के वरिष्ठ नेता एवं पूर्व राज्यमंत्री अवधेश नायक का निवास है. भले ही अवधेश नायक इस उपचुनाव में प्रत्याशी नहीं हैं, लेकिन उनकी राजनीतिक भूमिका और अगला कदम दोनों ही प्रमुख दलों—भाजपा और कांग्रेस—के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
हाल ही में भाजपा प्रत्याशी आशुतोष तिवारी की अवधेश नायक से हुई सौजन्य मुलाकात के बाद राजनीतिक चर्चाओं का दौर और तेज हो गया है. इस मुलाकात ने दतिया की राजनीति में नए समीकरणों को लेकर अटकलों को हवा दे दी है.
अवधेश नायक लंबे समय तक भारतीय जनता पार्टी से जुड़े रहे. वर्ष 2003 में उमा भारती के नेतृत्व में हुए विधानसभा चुनाव में वे भाजपा के उम्मीदवार थे. उस समय मुख्यमंत्री उमा भारती ने अपने चुनाव अभियान की शुरुआत दतिया स्थित मां पीतांबरा पीठ से की थी. बाद में जब उमा भारती ने भारतीय जनशक्ति पार्टी का गठन किया, तब अवधेश नायक भी उनके साथ चले गए.
मध्य प्रदेश में परिसीमन के बाद दतिया की राजनीति में डॉ. नरोत्तम मिश्रा का प्रभाव बढ़ा. इस दौरान अवधेश नायक मध्य प्रदेश पथ्य पुस्तक निगम के उपाध्यक्ष रहे और उन्हें राज्यमंत्री का दर्जा भी प्राप्त था. भाजपा में लगातार उपेक्षा महसूस होने के बाद उन्होंने कांग्रेस का दामन थाम लिया.
पिछले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने पहले उन्हें उम्मीदवार बनाया, लेकिन अंतिम समय में टिकट बदल दिया. बताया गया कि उन्हें भरोसा दिलाया गया था कि अगली बार पार्टी उन्हें अवसर देगी. इसी विश्वास के साथ उन्होंने इस उपचुनाव के लिए नामांकन पत्र भी खरीदा, लेकिन कांग्रेस ने अंततः कुंवर घनश्याम सिंह को अपना प्रत्याशी घोषित कर दिया.
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अवधेश नायक का ब्राह्मण समाज और अपने समर्थकों के बीच अच्छा प्रभाव है. यही वजह है कि कांग्रेस उनकी नाराजगी को लेकर सतर्क है, जबकि भाजपा भी उन्हें अपने पक्ष में लाने के प्रयास करती दिखाई दे रही है. सूत्रों के अनुसार कई भाजपा नेताओं ने उनसे संपर्क किया है और भाजपा प्रत्याशी आशुतोष तिवारी भी उनसे मुलाकात कर चुके हैं.
हालांकि, तमाम अटकलों के बीच अवधेश नायक ने अभी तक अपने राजनीतिक रुख का खुलासा नहीं किया है. उन्होंने किसी भी दल के समर्थन या चुनाव प्रचार को लेकर सार्वजनिक रूप से कोई घोषणा नहीं की है. ऐसे में दतिया उपचुनाव में उनकी अगली रणनीति पर सभी की नजरें टिकी हुई हैं. राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यदि अवधेश नायक खुलकर किसी एक पक्ष के समर्थन में आते हैं तो इसका असर चुनावी समीकरणों पर पड़ सकता है.