Bhopal Fire System Failure: मेट्रोपॉलिटन शहर का दर्जा पाने वाला भोपाल विकास के दावों में भले ही आगे दिखता हो, लेकिन जमीनी हकीकत इससे बिल्कुल उलट है. शहर की सुरक्षा की रीढ़ माने जाने वाला भोपाल नगर निगम का फायर सिस्टम खुद आग के सामने बेबस नजर आ रहा है. हालत यह है कि निगम के पास मौजूद आग बुझाने के करीब 60 प्रतिशत संसाधन या तो जर्जर हो चुके हैं या पूरी तरह कबाड़ की स्थिति में हैं. जो दमकल गाड़ियां बची हैं, वे भी इतनी खराब हालत में हैं कि जब तक मौके पर पहुंचती हैं, तब तक आग सब कुछ राख कर चुकी होती है.
कबाड़ में तब्दील फायर ब्रिगेड का बेड़ा
भोपाल नगर निगम के फायर सिस्टम की तस्वीरें ही इसकी बदहाली बयां करने के लिए काफी हैं. निगम की सबसे महंगी और बड़ी हाइड्रोलिक क्रेन खुद पंचर हालत में खड़ी है. दूसरी हाइड्रोलिक क्रेन अपनी तय उम्र पूरी कर चुकी है और अब कबाड़ में तब्दील हो चुकी है. बाकी दमकल गाड़ियों की हालत ऐसी है कि अक्सर धक्का लगाकर चालू करनी पड़ती है. ज्यादातर फायर वाहनों की उम्र 20 साल से ज्यादा की हो चुकी है.
27 लाख आबादी, जिम्मेदारी सिर्फ 400 कर्मचारियों पर
भोपाल करीब 420 वर्ग किलोमीटर में फैला हुआ शहर है, जहां आबादी 27 लाख से ज्यादा है. लेकिन इस पूरे शहर की अग्नि सुरक्षा का जिम्मा सिर्फ करीब 400 फायर कर्मचारियों के कंधों पर है. इतने बड़े शहर के लिए यह संख्या बेहद कम मानी जा रही है. पुराने और खराब वाहनों के भरोसे ये कर्मचारी हर दिन जान जोखिम में डालकर आग से लड़ने निकलते हैं.
गर्मी बढ़ी, आगजनी के मामले भी बढ़े
अप्रैल का महीना शुरू होते ही गर्मी अपने तीखे तेवर दिखाने लगी है. इसके साथ ही आग लगने की घटनाएं भी तेजी से बढ़ रही हैं. फायर स्टेशनों पर रोज़ाना 10 से 15 आगजनी के मामले दर्ज हो रहे हैं. लेकिन संसाधनों की भारी कमी के चलते दमकल विभाग कई बार समय पर और प्रभावी कार्रवाई नहीं कर पा रहा. ऊपर से स्टाफ की कमी और अनुभवी, प्रशिक्षित कर्मियों का अभाव हालात को और कठिन बना रहा है.
न अधिकारियों के पास साधन, न कर्मचारियों के पास सुविधा
नगर निगम के अधिकारी खुद मानते हैं कि फायर विभाग के संसाधन बेहद सीमित हैं और वाहनों की उम्र काफी हो चुकी है. हालात इतने खराब हैं कि कई फायर स्टेशनों में कर्मचारियों के लिए बुनियादी सुविधाएं भी नहीं हैं. आग बुझाने जाने वाले कर्मियों के पास न तो आधुनिक उपकरण हैं, न सही सुरक्षा किट और कई बार पैरों में पहनने के लिए ढंग के जूते तक नहीं मिलते.
कर्मचारियों की जुबानी, सिस्टम की सच्चाई
फायर विभाग के सबसे पुराने कर्मचारियों में से एक हरचरण बताते हैं कि सीमित साधनों में काम करना बेहद मुश्किल हो गया है. उनका कहना है कि 42 दमकलों के भरोसे 25 लाख से ज्यादा आबादी वाले शहर की सुरक्षा करना लगभग नामुमकिन होता जा रहा है. संसाधनों की कमी में हर आग एक बड़ा खतरा बन जाती है.
ऊंची इमारतें बढ़ीं, तैयारी पीछे छूटी
राजधानी भोपाल में अब 80 मीटर तक ऊंची इमारतें खड़ी हो चुकी हैं, लेकिन निगम के पास सिर्फ एक 52 मीटर ऊंचाई तक पहुंचने वाली हाइड्रोलिक क्रेन है, जो फिलहाल पंचर हालत में है. दूसरी हाइड्रोलिक सिर्फ 22 मीटर लंबी है, जिसकी उम्र भी पूरी हो चुकी है. ऐसे में ऊंची इमारतों में आग या रेस्क्यू ऑपरेशन बड़े जोखिम में बदल जाते हैं.
ये आंकड़े डराने वाले हैं
- शहर के फायर सिस्टम की हालत आंकड़ों में और ज्यादा चिंताजनक नजर आती है.
- करीब 60 प्रतिशत फायर वाहन अपनी उम्र पूरी कर चुके हैं.
- 32 दमकल गाड़ियों में से 16 गाड़ियां 20 से 46 साल पुरानी हैं.
- भोपाल को आदर्श स्थिति में 800 से 1000 फायर कर्मियों की जरूरत है, लेकिन तैनात सिर्फ 410 कर्मचारी हैं.
- इनमें से बड़ी संख्या संविदा कर्मचारियों की है, जिन्हें पिछले 15 साल से न तो नियमित भर्ती मिली और न ही पर्याप्त ट्रेनिंग.
- जोखिम भरे काम के बावजूद कर्मचारियों का वेतन महज 10 से 11 हजार रुपये के आसपास है.
आगजनी की बड़ी घटनाओं ने खोली पोल
- बीते कुछ सालों में भोपाल में कई बड़ी आगजनी की घटनाएं हो चुकी हैं, जिन्होंने फायर सिस्टम की पोल खोल दी.
- मार्च 2024 में वल्लभ भवन (मंत्रालय) में लगी भीषण आग को बुझाने के लिए सेना और पड़ोसी जिलों से मदद मांगनी पड़ी.
- फरवरी 2026 में फर्नीचर और प्लास्टिक फैक्ट्री की आग बुझाने में घंटों लग गए.
- हाल ही में होटल सायाजी और जेपी अस्पताल जैसी जगहों पर भी आग की घटनाओं ने प्रशासनिक लापरवाही और उपकरणों की कमी को उजागर किया.