भोपाल का ‘90 डिग्री ब्रिज’ बना सिस्टम फेलियर की कहानी! 9 माह बाद क्‍यों नहीं हुआ शुरू?

Bhopal 90 Degree Bridge नौ माह बाद भी शुरू नहीं हो पाया है. 18 करोड़ रुपये की लागत से बना यह पुल तकनीकी खामियों और कथित भ्रष्टाचार के कारण अब तक बंद है, जिससे जनता में नाराजगी बढ़ रही है.

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ANI

Bhopal 90 Degree Bridge: मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल का चर्चित 90 डिग्री ब्रिज एक बार फिर सुर्खियों में है. हैरानी की बात यह है कि एक साल बीत जाने के बाद भी यह पुल शुरू नहीं हो पाया है. इसका उद्घाटन जून 2025 में प्रस्तावित था, लेकिन उससे पहले ही इसमें हुए भ्रष्टाचार और तकनीकी खामियों की पोल खुल गई. पढ़‍िए हरप्रीत कौर रीन की रिपोर्ट.

8 साल इंतजार, 18 करोड़ खर्च…फिर भी बंद पड़ा ब्रिज

भोपाल में बरखेड़ी को ऐशबाग से जोड़ने वाला यह ब्रिज करीब 18 करोड़ रुपये की लागत से तैयार हुआ. 8 साल के लंबे इंतजार के बाद भी यह जनता के लिए नहीं खुल पाया है. रिपोर्ट सामने आने के बाद PWD के 8 इंजीनियरों को सस्पेंड किया गया था, लेकिन इसके बावजूद समस्या का समाधान नहीं हो सका.

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डिजाइन में बड़ी चूक बनी मुसीबत

ब्रिज निर्माण में गोल पिलर की जगह चौकोर पिलर बनाए गए, जो इंजीनियरिंग के लिहाज से सही नहीं माने जाते. इसके अलावा 90 डिग्री का तीखा मोड़ भी बड़ी तकनीकी खामी साबित हुआ. विशेषज्ञों के मुताबिक, ऐसे मामलों में घुमावदार और स्मूद कर्व दिया जाना चाहिए था, लेकिन लापरवाही के चलते यह पुल अब सिर्फ एक “शोपीस” बनकर रह गया है.  

Bhopal 90 Degree Bridge

रीडिजाइन पर अटकी फाइल

बताया जा रहा है कि ब्रिज के रीडिजाइन को लेकर फाइल रेलवे के पास लंबित है, जबकि रेलवे अधिकारी इस दावे से इनकार कर रहे हैं. ऐसे में विभागों के बीच समन्वय की कमी साफ नजर आ रही है.

जनता में नाराजगी, ‘शहर की बदनामी' का बना कारण

स्थानीय नागरिकों का कहना है कि इस ब्रिज ने भोपाल की छवि को नुकसान पहुंचाया है. लोगों का सवाल है कि आखिर कब तक यह पुल यूं ही बंद पड़ा रहेगा. क्षेत्र की जनता जल्द से जल्द ब्रिज को दुरुस्त कर चालू करने की मांग कर रही है.

CM की दखल के बाद भी नहीं निकला हल

मामले में मुख्यमंत्री स्तर तक दखल के बावजूद एक साल में कोई ठोस समाधान नहीं निकल पाया. इससे साफ है कि निर्माण में हुई गड़बड़ियां इतनी गंभीर हैं कि सुधार की राह भी आसान नहीं है.

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जहां 90 डिग्री का मतलब गणित में समकोण होता है, वहीं भोपाल का यह ब्रिज अधिकारियों और ठेकेदारों की लापरवाही और भ्रष्टाचार का प्रतीक बन गया है. करोड़ों रुपये खर्च होने के बावजूद जनता को इसका कोई लाभ नहीं मिला, और अंत में नुकसान सिर्फ आम लोगों को ही उठाना पड़ रहा है. 

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