2 बोरी खाद के लिए 600 किमी दूर मिला केंद्र! किसानों के लिए मुसीबत बनी ई-टोकन व्यवस्था

मध्य प्रदेश के बैतूल में ई-टोकन व्यवस्था ने किसानों की मुश्किलें बढ़ा दी हैं. ग्राम खारी के एक किसान को सिर्फ दो बोरी यूरिया लेने के लिए करीब 600 किलोमीटर दूर ग्वालियर का टोकन जारी कर दिया.

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खरीफ सीजन में किसानों के लिए समय पर खाद मिलना सबसे बड़ी जरूरत होती है, लेकिन बैतूल के एक किसान के साथ जो हुआ उसने खाद वितरण व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं. ग्राम खारी के किसान को महज दो बोरी यूरिया लेने के लिए ई-टोकन तो जारी हुआ, लेकिन केंद्र बैतूल या आसपास का नहीं, बल्कि करीब 600 किलोमीटर दूर ग्वालियर का निकला. 

किसान का कहना है कि वह कभी ग्वालियर गया तक नहीं, ऐसे में वहां से खाद कैसे लाए? कालाबाजारी रोकने के उद्देश्य से शुरू की गई ई-टोकन प्रणाली अब किसानों के लिए राहत की बजाय परेशानी का कारण बनती दिखाई दे रही है.

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दो बोरी यूरिया के लिए 600km का सफर

बैतूल जिले के ग्राम खारी के एक किसान को दो बोरी यूरिया खाद के लिए ई-टोकन जारी किया, लेकिन टोकन पर आवंटित केंद्र ग्वालियर का निकला. किसान यह देखकर हैरान रह गया. उसका कहना है कि उसने स्थानीय स्तर पर खाद के लिए आवेदन किया था, फिर उसे सैकड़ों किलोमीटर दूर स्थित केंद्र का टोकन कैसे जारी हो गया?

पहले भी सामने आ चुकी हैं शिकायतें

यह कोई पहला मामला नहीं है. जिले के कई किसानों ने पहले भी शिकायत की है कि उन्हें 50 किलोमीटर, 80 किलोमीटर और यहां तक कि 120 किलोमीटर दूर स्थित खाद वितरण केंद्रों के लिए ई-टोकन जारी किए. अब ग्वालियर जैसे दूसरे जिले का टोकन सामने आने के बाद ई-टोकन व्यवस्था की विश्वसनीयता पर सवाल उठने लगे हैं. किसानों का कहना है कि व्यवस्था में तकनीकी सुधार की तत्काल जरूरत है.

तीन दिन की समय सीमा भी बनी परेशानी

किसानों के अनुसार ई-टोकन प्रणाली में एक और बड़ी समस्या सामने आ रही है. टोकन मिलने के बाद केवल तीन दिन के भीतर खाद उठाने की समय सीमा तय की गई है. कई मामलों में किसानों को यूरिया एक केंद्र से और एनपीके या अन्य उर्वरक दूसरे केंद्र से लेने के निर्देश मिल रहे हैं. दोनों केंद्रों के बीच लंबी दूरी होने के कारण समय पर खाद लेना मुश्किल हो जाता है.

जरूरत यूरिया की, मजबूरी एनपीके खरीदने की

किसानों का कहना है कि वर्तमान में खरीफ फसलों के लिए उन्हें यूरिया की जरूरत है, लेकिन ई-टोकन व्यवस्था के तहत कई बार एनपीके उर्वरक भी लेने का दबाव बन रहा है. उनका कहना है कि खेती की वर्तमान जरूरत के अनुरूप खाद नहीं मिलने से आर्थिक नुकसान हो रहा है. कई किसान ऐसे उर्वरक खरीदने को मजबूर हैं जिनकी तत्काल आवश्यकता नहीं है.

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किसानों पर बढ़ रहा आर्थिक बोझ

ग्रामीणों का कहना है कि अनावश्यक उर्वरक खरीदने से उनकी रकम फंस रही है. जिन किसानों ने पहले से खेती के लिए कर्ज लिया हुआ है, उनके लिए यह अतिरिक्त बोझ बन रहा है. यदि जरूरत के मुताबिक खाद न मिले तो फसल उत्पादन भी प्रभावित हो सकता है. किसानों का मानना है कि वर्तमान व्यवस्था उनकी समस्याएं कम करने के बजाय बढ़ा रही है.