Sandstone Artisans: मध्य प्रदेश के अशोकनगर जिले का कदवाया गांव पंचायत 'विधवाओं का गांव' में तब्दील हो चला है, जहां ज्यादातर महिलाएं अपने पति को खो चुकी हैं और विधवाओं की तरह जीवन बिता रही हैं. वजह पति का पेशा है, जो अब उनके अस्तित्व के लिए संकट बन गया है. बलुआ पत्थरों को तराशकर परिवार चलाने वाले सैकड़ों घरों के मुखिया बीमारी में जिदगी की जंग हार गए, जिससे उनका परिवार अकेला रह गया है.
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फेफड़ों को संक्रमित करते हैं बलुआ पत्थरों निकलने वाले सिलिका के धूल
गौरतलब है कदवाया गांव पंचायत में बलुआ पत्थरों को तराशने का काम किया जाता है, लेकिन बलुआ पत्थरों को तराशने से निकलने वाले महीन सिलिका के धूल कारीगरों के फेफड़ों को संक्रमित करती है, जिसी वजह सैकड़ों कारीगर टीवी की बीमारी के शिकार होकर अपनी जान गंवा चुके हैं. बताते हैं ज्यादातर कारीगर सही समय पर इलाज नही मिलने से दम तोड़ देते हैं.
सर्करा खदान के सैकड़ों कारीगर फेफड़ों के संक्रमण से जा चुकी है जान
रिपोर्ट के मुताबिक कदवाया पंचायत में पत्थर तराशने का काम करने वाले सैकड़ों सर्करा खदान के कारीगर फेफड़ों के संक्रमण से जान जा चुकी है, जिसके चलते बड़ी संख्या में महिलाएं विधवा हो चुकी हैं. अनियमित और सबसे असुरक्षित खदानों में से एक सकर्रा की खदान में काम करने वाले मजदूरों में फेफड़ों की घातक बीमारी सिलिकोसिस (Silicosis) होने का जोखिम अधिक होता है.
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जी तोड़ मेहनत के बाद 500-1000 रुपए की दिहाड़ी पाती हैं विधवाएं
फेफड़ों के संक्रमण में अपने पतियों को खो चुकी सैकड़ों विधवाएं पति की मौत के बाद उनकी आर्थिक स्थिति कमजोर हो गई है, तो उन्हें मजबूरन खदान में काम करना पड़ता है. सकर्रा पत्थर की खदान से निकलने वाले बलुआ पत्थरों को तराशकर मूर्तियां, सिलबट्टा बनवाने वाले ठेकेदारों को सैकड़ों कारीगरों की मौत के बाद भी कोई असर नहीं पड़ा है और कारीगरों के स्वास्थ्य और उनकी बीमारी के इलाज में कोई कदम नहीं उठाते हैं.
सर्करा खदान के बलुआ पत्थरों को आकार देते कारीगर
ग्राम पंचायत में घुट-घुट कर जीने को मजबूर हैं 400 से अधिक विधवाएं
शासन के रिकॉर्ड के मुताबिक ग्राम पंचायत कदवाया में 400 विधवा महिलाएं हैं, जबकि सकर्रा में 50 के आसपास विधवा महिलाएं है. हालांकि कई विधवा महिलाओं का अभी शासकीय रिकॉर्ड मैं नाम तक दर्ज नही है. चौंकाने वाली बात ये है कि यहां की सभी महिलाएं अपने पतियों की मौत की वजह जानने के बावजूद अपने बच्चों को पालने के लिए उन्हीं खदानों में काम कर रही है, जिससे जानलेवा सिलिकोसिस बीमारी मिलती है.
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बलुआ पत्थर कारीगरों को बहुत देर में होती है बीमारी की जानकारी
फेफड़ों के संक्रमण से श्वसन तंत्र से जुड़ी बीमारियां से जूझ रहे मरीज अमूमन तभी डॉक्टर्स के पास पहुंचते हैं, जब हालात बेहद खराब हो चुके होते हैं. बीमारी के गंभीर स्टेज पर पहुंचने के बाद जब कभी इलाज शुरू होता है, तो मरीजों को ज्यादा फायदा नहीं मिल पाता है. मौत के गाल में समा चुके बलुआ पत्थर कारीगर दीपक अहिरवार की पत्नी ने बताया कि फेफड़ों की बीमारी में उनके देवर और पति दोनों की जान चली गई.
सकर्रा की खदानें काम करने के लिहाज से बहुत ज्यादा असुरक्षित हैं
कई रिपोर्ट्स में खुलासा किया जा चुका है कि सकर्रा की खदानें काम करने के लिहाज से बहुत ही ज्यादा असुरक्षित हैं. इन खदानों के ज्यादातर मजदूरों में फेफड़े की जानलेवा बीमारी सिलिकोसिस का खतरा ज्यादा रहता है, बावजूद बिना किसी सुरक्षा मानकों के कारीगर ऐसे खदानों में काम करने को मजबूर है, जिसके लिए शासन की तरफ से भी ठेकेदारों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं जाती है.
खदान में मारे गए मजूदर परिवारों से किसी को कोई सहानुभूति नहीं
सकर्रा खदान में अपने पति को खो चुकी दर्जनों महिलाएं का कहना है कि राज्य सरकार या खदान मालिक पीड़ित परिवारों की मदद करने को तैयार नहीं हैं. उन्हें खदान में काम करते-करते मारे गए मजूदरों के परिवारों से कोई सहानुभूति है. सर्करा खदान में कितने लोग मारे गए, इसका आंकड़ा भी पंचायत के पास नहीं है. सबसे बड़ी बात है कि कागजों में खदान को बंद कर दिया है, लेकिन खदान चोरी छुपे आज भी सामान्य रूप से चल रहा है.
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