गरियाबंद: त्रिवेणी संगम पर बसा है छत्तीसगढ़ का ‘प्रयाग’, हर साल होता है कुंभ

छत्तीसगढ़ का ‘प्रयाग’ कहा जाने वाले राजिम इसी जिले में आता है, जो अपने धार्मिक महत्व के लिए जाना जाता है. राजिम में त्रिवेणी संगम पर हर साल कुंभ मेला लगता है. ये जिला अपने दो देवी मंदिरों जतमई और घटारानी मंदिर के लिए भी जाना जाता है.

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साल 2012 में अस्तित्व में आया गरियाबंद जिला अपनी सांस्कृतिक विरासत और प्राकृतिक सुंदरता के लिए जाना जाता है. जिले का करीब 38 प्रतिशत हिस्सा वन भूमि है और करीब 36 प्रतिशत आबादी जनजातियों की है. छत्तीसगढ़ का ‘प्रयाग' कहा जाने वाले राजिम इसी जिले में आता है, जो अपने धार्मिक महत्व के लिए जाना जाता है. राजिम में त्रिवेणी संगम पर हर साल कुंभ मेला लगता है. ये जिला अपने दो देवी मंदिरों जतमई और घटारानी मंदिर के लिए भी जाना जाता है, यहां खूबसूरत वॉटरफॉल भी है, जो प्रमुख पर्यटन का केंद्र है.

यहां है छत्तीसगढ़ का ‘प्रयाग'

सोंढूर, पैरी और महानदी के संगम पर बसा राजिम त्रिवेणी संगम की वजह से छत्तीसगढ़ का ‘प्रयाग' कहा जाता है. यहां हर साल माघ पूर्णिमा से शिवरात्रि तक कुंभ मेले का आयोजन किया जाता है. यहां मौजूद राजीव लोचन मंदिर के नाम पर इस जगह का नाम राजिम पड़ा. आठवीं-नौवीं सदी में बने राजीव लोचन मंदिर के चार कोनों पर भगवान विष्णु के चार रूप दिखाई देते हैं. मंदिर में 12 स्तंभ हैं. राजिम के तट पर ही कुलेश्वर महादेव का मंदिर भी है. वनवास काल में भगवान राम ने यहीं अपने कुलदेव महादेव की पूजा की थी. इसके अलावा भी राजिम में ढेरों मंदिर हैं, जो आस्था से जुड़े हैं. यह क्षेत्र महान स्वतंत्रता सेनानी और समाज सुधारक पं. सुंदरलाल शर्मा की कर्म भूमि के रूप में भी जाना जाता है.

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घटारानी वॉटरफॉल

राजधानी रायपुर से करीब 85 किलोमीटर की दूरी पर जंगल के बीच घटारानी मंदिर और जलप्रपात मौजूद है. चारों तरफ से हरियाली से घिरा ये वॉटरफॉल करीब 40 फीट की उंचाई से गिरता है और बेहद खूबसूरत नजर आता है. घटारानी के पास ही जतमई माता का मंदिर भी है. एक विशाल मिनार और कई छोटे मिनारों वाला ये मंदिर ग्रेनाइट पत्थर से बना है. मंदिर के गर्भगृह में माता जतमई की प्रतिमा विराजमान हैं. जंगल के बीच बसे इस मंदिर के पास भी एक खूबसूरत झरना बहता है.

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जनजातियों का बसेरा

गरियाबंद आदिवासी बहुल जिला है, यहां करीब 36.14 प्रतिशत आबादी जनजातियों की है. जिले में गोंड, कंवर, तेली, कलार, कमार और भुंजिया जनजाति निवास करते हैं. गोंड जनजाति के लोग पूरे जिले में बसे हैं और सबसे बड़ी जनजाति के रूप में जाने जाते हैं. इस जनजाति की खासियत उनके विवाह संस्कार से जुड़ी है. इस जनजाति में विवाह के अवसर पर लड़की वाले बारात लेकर लड़के के घर जाते हैं, इसे पठौनी-विवाह कहते हैं.

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गरियाबंद जिला एक नजर में

  • क्षेत्रफल: 5,822.861 वर्ग किमी.
  • आबादी: 5,97,653
  • विधानसभा क्षेत्र- 2
  • भाषा: हिन्दी, छत्तीसगढ़ी
  • गांव: 710
  • पुरुष: 2,95,851
  • महिला: 3,01,802