तापसी पन्नू का बेबाक सफर, क्या हिंदी सिनेमा की हैं असली OG प्रोटैगनिस्ट ?

Taapsee Pannu Latest: तापसी सुरक्षित किरदार नहीं चुनतीं, वह जरूरी किरदार चुनती हैं. थप्पड़ में थप्पड़ खाई पत्नी का सधा हुआ गुस्सा हो, पिंक में बलात्कार पीड़िता की नैतिक दृढ़ता, या सांड की आंख में शार्पशूटर की इस्पाती एकाग्रता, उनके किरदार कभी बैकग्राउंड नॉइज नहीं बनते.

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Taapsee Pannu Latest: बेबी (Baby) से लेकर पिंक (Pink), थप्पड़ (Thappad) से रश्मि रॉकेट (Rashmi Rocket) तक, तापसी पन्नू (Taapsee Pannu) ने अपने लिए एक ऐसी राह बनाई है. जहां स्क्रिप्ट सिर्फ बोलती नहीं, चुभती भी है. अस्सी क्षितिज पर है और तापसी उस निडर जोन में हैं जहां हर जगह एक बयान लगता है, सिर्फ एक सीन नहीं.

'पिंक' में बलात्कार पीड़िता

तापसी सुरक्षित किरदार नहीं चुनतीं, वह जरूरी किरदार चुनती हैं. थप्पड़ में थप्पड़ खाई पत्नी का सधा हुआ गुस्सा हो, पिंक में बलात्कार पीड़िता की नैतिक दृढ़ता, या सांड की आंख में शार्पशूटर की इस्पाती एकाग्रता, उनके किरदार कभी बैकग्राउंड नॉइज नहीं बनते. बदला, हसीन दिलरुबा या खेल खेल में जैसे हल्के, जॉनर-बेंडिंग प्रोजेक्ट्स में भी वह वही तीव्रता लेकर आती हैं, जिससे थ्रिलर, रोम-ड्रामा और कॉमेडी भावनात्मक सटीकता के शोकेस बन जाते हैं. उनके चुनावों ने सिर्फ तालियां नहीं, ट्रॉफियां भी दिलाई हैं. दिल्ली में जन्मी और सॉफ़्टवेयर इंजीनियर के रूप में प्रशिक्षित तापसी की फिल्मों में एंट्री कभी सीधी रेखा नहीं रही. उन्होंने तेलुगू और तमिल सिनेमा से शुरुआत की, फिर चश्मे बद्दूर (2013) से हिंदी डेब्यू किया. लेकिन बेबी (2015) ने उन्हें असल पहचान दिलाई. एक एक्शन-हेवी, पुरुष-प्रधान कहानी में भी अपनी मजबूत मौजूदगी दर्ज कराते हुए. तब से उन्होंने मिशन मंगल और डंकी जैसी मेनस्ट्रीम हिट्स के साथ-साथ मुल्क, मनमरजियां और रश्मि रॉकेट जैसी मुद्दा-प्रधान फिल्मों को संतुलित किया है. एक ऐसी फ़िल्मोग्राफी बनाते हुए जो जितनी विविध है, उतनी ही निडर.

शोर न मचाकर असर छोड़ना

तापसी को अलग बनाता है उनका शोर न मचाकर असर छोड़ना. पिंक में अदालत की एक खामोश ठहराव, थप्पड़ का एक थप्पड़, रश्मि रॉकेट की एक दृढ़ दौड़, उनकी ताकत संयम में है, ठहराव में है, उस नजर में है जो कभी झुकती नहीं. अस्सी उसी शांत उग्रता की भाषा में एक और अध्याय जोड़ती है, जहां किरदार की आग धीरे-धीरे सुलगती है, पर कभी बुझती नहीं. तापसी पन्नू की यात्रा स्टारडम से कम और सब्सटेंस से ज्यादा है. वह ऐसे किरदार चुनती हैं जो विशेषाधिकारों पर सवाल उठाते हैं और फिर ऐसे अभिनय करती हैं जो दर्शक को नजरें फेरने नहीं देते. हर फिल्म के साथ वह भारतीय सिनेमा में एक लीडिंग वुमन की परिभाषा को फिर से लिखती हैं, बेबाक, परतदार, और हमेशा अपनी कहानी की कमान खुद थामे हुए.

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