आस्था का 'महाकुंभ' है माता मावली मेला; नक्सल खौफ पर भारी भक्ति, अबूझमाड़ से उमड़ा जनसैलाब 

नारायणपुर में विश्व प्रसिद्ध माता मावली मेले की शुरुआत बस्तर की संस्कृति और आस्था के महाकुंभ के रूप में हुई है. इस वर्ष अबूझमाड़ से बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचे, जिससे नक्सल दहशत पर भक्ति भारी दिखी. ‘मावली परघाव’ और देवखेलनी जैसी परंपराओं के साथ दैवीय जुलूसों ने पूरे क्षेत्र को भक्तिमय बना दिया.

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Mata Mavli Mela Narayanpur: छत्तीसगढ़ के नारायणपुर में शुरू हुआ विश्व प्रसिद्ध माता मावली मेला सिर्फ एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि बस्तर की जीवंत संस्कृति और आस्था का महाकुंभ है. नक्सल प्रभावित अबूझमाड़ क्षेत्र में भक्ति की ऐसी लहर उमड़ी है कि दहशत का साया भी फीका पड़ गया. सदियों पुरानी परंपरा और आदिवासी विरासत को संजोए यह पांच दिवसीय मेला पूरे इलाके में उत्साह और आध्यात्मिक ऊर्जा का अनोखा वातावरण बना रहा है.

परंपरा के साथ मेले की शुरुआत

नारायणपुर में माता मावली मेला ‘मावली परघाव' की ऐतिहासिक रस्म से शुरू हुआ. सुबह विशेष पूजा के बाद देवी-देवताओं की डोलियां और छत्र मंदिर से निकलकर बुधवार बाजार पहुंचे, जहां देवखेलनी का भव्य आयोजन हुआ. हजारों की भीड़ ने ढोल-नगाड़ों और जयकारों के बीच इस अनोखे दृश्य का स्वागत किया. युवाओं से लेकर बुजुर्गों तक, हर कोई अपनी संस्कृति पर गर्व महसूस करता नजर आया.

देवखेलनी और दैवीय यात्रा का अनोखा रंग

देवखेलनी के बाद देवी-देवताओं का दैवीय कारवां महावीर चौक स्थित भवर देव के स्थल, फिर जगदीश मंदिर, महादेव घाट और माता कोटगुड़ि़न के दर्शन करता हुआ गढ़िया बाबा मंदिर पहुंचा. इसके बाद मेले स्थल की ढाई कोसी परिक्रमा कर माता मावली से अनुमति लेने के साथ मेला विधिवत आरंभ हुआ. यह यात्रा आदिवासी परंपराओं की सैकड़ों वर्षों पुरानी धरोहर को जीवंत बनाती है.

आदिवासी विरासत की झलक

मावली मेला अपने आप में आदिवासी समाज का जीवित इतिहास है. बिना किसी लिखित दस्तावेज के पीढ़ियों से चली आ रही परंपराएं देवी-देवताओं की डोलियां, आंगा देव का नृत्य और पारंपरिक वाद्य यंत्रों की थाप मेले को अद्वितीय बनाती हैं. छोटे बच्चे भी देवस्थानों पर चिह्न लेकर चलते हैं, जो इस विरासत के सहज हस्तांतरण को दर्शाता है.

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नक्सल छाया पर भारी पड़ी आस्था

इस वर्ष मेले की सबसे बड़ी विशेषता यह रही कि अबूझमाड़ के दूर-दराज इलाकों से भी भारी संख्या में ग्रामीण शामिल हुए. जो लोग वर्षों तक नक्सली दहशत के कारण मेले में नहीं आ पाते थे, वे अब उत्साह के साथ अपनी आराध्य देवी के दर्शन के लिए पहुंचे. पुलिस सुरक्षा, विकास कार्यों और शांति-बहाली ने लोगों में आत्मविश्वास बढ़ाया है और यह दृश्य बताता है कि आस्था हर डर से बड़ी है.

श्रद्धालुओं के लिए व्यवस्थाएं और स्थानीय जनप्रतिनिधियों की भूमिका

नगर पालिका द्वारा पानी, बिजली, सफाई और दुकानों की व्यवस्था सुव्यवस्थित की गई है. मेले में सैकड़ों दुकानों और खाद्य स्टॉल्स ने रौनक बढ़ा दी है. आयोजन स्थल पर नगर पालिका अध्यक्ष इंद्रप्रकाश बघेल, जिला पंचायत अध्यक्ष नारायण मरकाम और युवा जिला पंचायत सदस्य स्थानाथ उसेंडी ने व्यवस्थाओं का जायजा लिया और श्रद्धालुओं को सुविधा देने पर जोर दिया.

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आस्था, संस्कृति और एकता का असली पर्व

माता मावली मेला बस्तर की आस्था, संस्कृति और एकता का असली पर्व है. 15 फरवरी तक चलने वाले इस आयोजन में आदिवासी लोक-जीवन के कई रंग दिखाई देंगे. जहां परंपरा बगैर किसी डर के पूरी शिद्दत से निभाई जाती है. यह मेला साबित करता है कि जब आस्था और संस्कृति साथ हों, तो कठिन से कठिन परिस्थितियां भी पीछे हट जाती हैं.