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अब लाल सलाम नहीं, लाइक और सब्सक्राइब": मुख्यधारा में लौटे नक्सलियों को स्मार्टफोन दे रही सरकार

Mainstream Returned Naxals: मेटा मुख्यधारा में लौटे नक्सलियों के लिए सरकार की खास पहल! अब उनके हाथों में बंदूक नहीं बल्कि स्मार्टफोन होंगे. रील बनाने और डिजिटल दुनिया से जुड़ने के इस नए सफ़र से कैसे बदल रही है उनकी ज़िंदगी, जानिए पूरी रिपोर्ट.

अब लाल सलाम नहीं, लाइक और सब्सक्राइब": मुख्यधारा में लौटे नक्सलियों को स्मार्टफोन दे रही सरकार

Chhattisgarh Naxal Surrender: छत्तीसगढ़ में बंदूक छोड़ मुख्यधारा में शामिल हुए पूर्व नक्सलियों के लिए सरकार एक ऐसी योजना लाई है, जो उनकी दुनिया को पूरी तरह 'अपडेट' कर देगी. पुनर्वास (Rehabilitation) की प्रक्रिया से गुजर रहे इन लोगों के लिए अब मोबाइल सिर्फ एक गैजेट नहीं, बल्कि समाज से जुड़ने का 'डिजिटल पुल' बनने जा रहा है. सरकार का मानना है कि जो लोग सालों तक घने जंगलों में बाहरी दुनिया से कटकर रहे, उन्हें समाज की रफ़्तार के साथ दौड़ने के लिए स्मार्टफोन से बेहतर कोई ज़रिया नहीं हो सकता. अब ये पूर्व नक्सली अपनी नई ज़िंदगी की रील बनाएंगे, देश-दुनिया की खबरें देखेंगे और सबसे बड़ी बात—पुरानी कड़वी यादों से पीछा छुड़ाकर 'डिजिटल एंटरटेनमेंट' की दुनिया में खुद को व्यस्त रखेंगे.

ये मुख्यधारा के साथ कदमताल: डिप्टी सीएम विजय शर्मा

छत्तीसगढ़ के उपमुख्यमंत्री विजय शर्मा इस कदम को पुनर्वास का एक अनिवार्य हिस्सा मान रहे हैं. उनका कहना है कि जो लोग समाज में वापस लौट आए हैं, उन्हें यह महसूस होना चाहिए कि वे भी आधुनिक भारत का हिस्सा हैं. मोबाइल के जरिए ये लोग जान पाएंगे कि बाहर की दुनिया कितनी बदल चुकी है और विकास के क्या-क्या नए अवसर मौजूद हैं. जब वे अपनी स्क्रीन पर देश की तरक्की की तस्वीरें देखेंगे, तो उनके सोचने का नजरिया खुद-ब-खुद बदल जाएगा और वे खुद को इस नए समाज का हिस्सा समझने लगेंगे.

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"माओवादी 'इन्फॉर्मेशन ब्लॉक' को तोड़ने की कोशिश"

नक्सल मामलों के जानकार संजीव गुप्ता इस मसले पर कहते हैं कि नक्सली संगठन के भीतर रहने के दौरान इन लोगों को बहुत ही सीमित और एकतरफ़ा जानकारी दी जाती थी. वहां सिर्फ माओवादी विचारधारा का ही बोलबाला रहता था. अब जब ये लोग पुनर्वास कैंपों में हैं और उनके हाथ में मोबाइल होगा, तो वह सालों पुराना 'इन्फॉर्मेशन ब्लॉक' टूट जाएगा. मोबाइल उनके लिए एक ऐसी खिड़की साबित होगा जिससे वे देख सकेंगे कि असली दुनिया में कितनी संभावनाएं और खुशियां भरी पड़ी हैं, जो उन्हें जंगलों में कभी नहीं बताई गईं.

तकनीक से 'मेंटल हीलिंग': डॉ. इला गुप्ता  

मनोचिकित्सक डॉ. इला गुप्ता का मानना है कि तकनीक का सकारात्मक उपयोग किसी भी व्यक्ति के मानसिक स्वास्थ्य को बेहतर बनाने में बड़ी भूमिका निभाता है. सालों तक हिंसा और डर के माहौल में रहने के बाद, जब ये लोग मोबाइल पर मनोरंजन करेंगे, अपनों से संवाद करेंगे या नई चीज़ें सीखेंगे, तो उनका आत्मविश्वास बढ़ेगा. यह 'डिजिटल थेरेपी' जैसा काम करेगा जो उन्हें समाज में घुलने-मिलने और पुरानी ज़िंदगी के तनाव को भुलाने में मदद करेगा. मोबाइल पर रील बनाना या वीडियो देखना उनके लिए एक नया और सुखद अनुभव होगा जो उन्हें समाज की मुख्यधारा की ओर तेज़ी से खींचेगा.

आंकड़ों में सुधार: पुनर्वास की दिशा में बढ़ते कदम

आंकड़े बताते हैं कि छत्तीसगढ़ में पुनर्वास की नीति असर दिखा रही है. हर साल करीब 2700 नक्सली हिंसा का रास्ता छोड़कर मुख्यधारा में लौट रहे हैं. इसके साथ ही सुरक्षा बलों की सख्ती भी जारी है; पिछले दो वर्षों में 532 नक्सली मुठभेड़ों में मारे गए और 2004 की गिरफ्तारी हुई है. बड़े नेताओं (पॉलिटब्यूरो और सीसीएम स्तर) के सफाए के बाद अब सरकार का पूरा जोर उन लोगों को बेहतर जीवन देने पर है जो सरेंडर कर चुके हैं. यह मोबाइल वितरण योजना इसी सामाजिक बदलाव का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है.

विचारधारा के अंत का 'डिजिटल' रास्ता: रील बनाम पुरानी यादें

अंततः, सरकार की यह पहल सिर्फ एक उपकरण देने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह एक बहुत बड़ी मनोवैज्ञानिक जीत है. जो व्यक्ति कल तक समाज के खिलाफ खड़ा था, आज वह उसी समाज की तरह मोबाइल चला रहा है, रील बना रहा है और डिजिटल दुनिया का आनंद ले रहा है. जब इन पुनर्वासित नक्सलियों को मनोरंजन और जानकारी का चस्का लगेगा, तो माओवादी विचारधारा की पुरानी और थकी हुई बातें खुद-ब-खुद बेमानी हो जाएंगी. यह कदम नक्सलवाद की जड़ पर प्रहार नहीं, बल्कि उन लोगों के पुनर्निर्माण (Rebuilding) का रास्ता है जो अब शांति की राह पर चल पड़े हैं. 
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