छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने रायपुर जेल में बंद उज्बेकिस्तान की दो महिला नागरिकों को उनके देश वापस भेजने का रास्ता साफ कर दिया है. न्यायालय के सूत्रों ने बताया कि उच्च न्यायालय ने दोनों महिलाओं की बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका का निपटारा करते हुए कहा कि चूंकि केंद्र और राज्य सरकार, दोनों ही उन्हें उनके देश वापस भेजने की प्रक्रिया में हैं, इसलिए इस मामले में आगे किसी न्यायिक निर्णय की आवश्यकता नहीं रह गई है.
याचिकाकर्ताओं फेरुज़ा साबिरोवा और दिनोरा सफ्युत्दीनोवा ने उच्च न्यायालय में याचिका दायर कर बताया था कि रायपुर पुलिस ने उन्हें 9 जनवरी 2026 से हिरासत में लिया था और 14 जनवरी 2026 से वे रायपुर केंद्रीय जेल के निरूद्ध केंद्र में बंद हैं.
पासपोर्ट और वीजा का विवाद
याचिका के अनुसार, फेरुज़ा साबिरोवा का पासपोर्ट और वीजा खो गया था, जबकि दिनोरा सफ्युत्दीनोवा का पासपोर्ट तो वैध है, लेकिन उसका वीजा 16 मई 2025 को समाप्त हो चुका था. इस वजह से रायपुर पुलिस ने 12 मार्च 2026 को दोनों के खिलाफ अप्रवास और विदेशी अधिनियम, 2025 की संबंधित धाराओं के तहत मामला दर्ज किया था.
याचिकाकर्ताओं ने अपनी रिहाई की मांग करते हुए कहा कि वे निम्न आय वर्ग से संबंध रखती हैं और केवल अपने रिश्तेदारों से मिलने तथा पर्यटक के रूप में भारत आई थीं. उनका कोई आपराधिक रिकॉर्ड नहीं है और न ही उनके खिलाफ कोई सिविल मामला लंबित है. उज़्बेकिस्तान दूतावास भी उन्हें वापस बुलाने की प्रक्रिया पूरी करने के लिए तैयार है.
भारत में अवैध रूप से रह रही थीं महिलाएं
दूसरी ओर, राज्य सरकार ने न्यायालय को बताया कि दोनों महिलाएं भारत में अवैध रूप से रह रही थीं, जिसके लिए उनके खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की गई क्योंकि यह एक संज्ञेय अपराध है. छत्तीसगढ़ सरकार के अनुसार, उन्हें 26 अप्रैल 2026 को औपचारिक रूप से गिरफ्तार किया गया और इसकी सूचना उनके परिजनों के साथ-साथ उज़्बेकिस्तान दूतावास नई दिल्ली व गृह मंत्रालय को भी दी गई थी.
गिरफ्तारी के बाद दोनों को मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट, रायपुर के समक्ष पेश किया गया, जहां से उन्हें न्यायिक रिमांड पर केंद्रीय जेल भेज दिया गया. राज्य सरकार ने तर्क दिया कि बिना वैध पासपोर्ट और वीजा के भारत में रहने के कारण उनकी हिरासत को अवैध नहीं कहा जा सकता.
मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायाधीश रविंद्र कुमार अग्रवाल की खंडपीठ के समक्ष सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार के वकीलों ने भरोसा दिलाया कि दोनों महिलाओं को जल्द ही उज़्बेकिस्तान भेजा जाएगा. उज़्बेकिस्तान दूतावास ने भी 25 मई 2026 को पत्र भेजकर न्यायालय से त्वरित निर्वासन का आदेश पारित करने का अनुरोध किया है और आवश्यक दस्तावेज जारी करने का आश्वासन दिया है.
उच्च न्यायालय ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद याचिका को यह कहते हुए समाप्त कर दिया कि जब केंद्र और राज्य सरकार दोनों ही उन्हें वापस भेजने के प्रस्ताव पर काम कर रही हैं, तो इस याचिका में आगे फैसले के लिए कुछ शेष नहीं बचता.
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