40 साल के लाल आतंक को 584 दिन के अभियान ने किया खत्म, बदली छत्तीसगढ़ की तस्वीर

छत्तीसगढ़ के नक्सल मुक्त होने पर राज्य के गृह मंत्री और उपमुक्यमंत्री विजय शर्मा ने बताया कि डेडलाइन तय होने के बाद सुरक्षाबलों ने तेज और सटीक ऑपरेशन शुरू किए. इस बार एंटीनक्सल अभियान में तकनीक आधारित इंटेलिजेंस सपोर्ट ने बड़ी भूमिका निभाई. घने जंगलों में भी माओवादियों की गतिविधियों पर नजर रखना संभव हो पाया. आधुनिक उपकरणों और रियलटाइम जानकारी के कारण सुरक्षा बलों को ऑपरेशन में निर्णायक बढ़त मिली. 

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31 मार्च को छत्तीसगढ़ के नक्सल मुक्त होने पर राज्य के गृह मंत्री और उपमुक्यमंत्री विजय शर्मा ने प्रेस से बात की. उस दौरान उन्होंने दावा किया कि देश में दशकों से चुनौती बने सशस्त्र माओवाद के अंत हो गया है. उन्होंने बताया कि केंद्र सरकार द्वारा तय डेडलाइन के भीतर चलाए गए व्यापक अभियान के बाद यह उपलब्धि हासिल की गई. 

गौरतलब है कि 24 अगस्त 2024 को केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने 31 मार्च 2026 तक माओवाद खत्म करने का लक्ष्य घोषित किया था, जिसे 584 दिनों के अभियान के जरिए पूरा करने का दावा किया जा रहा है. उन्होंने कहा कि अगर इच्छाशक्ति मजबूत हो, तो कोई भी लक्ष्य असंभव नहीं हो जाता है. माओवाद के खिलाफ चलाया गया यह अभियान उसी का उदाहरण बनकर सामने आया है. सुरक्षा बलों, सरकार की योजनाओं, सामाजिक संगठनों और संवाद की रणनीति ने मिलकर इस अभियान को सफल बनाया.

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 जनवरी 2024: पहली बार बना समूल खात्मे का रोडमैप

शर्मा ने बताया कि 21 जनवरी 2024 को रायपुर में माओवाद प्रभावित राज्यों के डीजीपी और केंद्रीय एजेंसियों के प्रमुखों की अहम बैठक हुई थी.  इसी बैठक में पहली बार माओवाद के पूर्ण खात्मे पर गंभीर चर्चा कर रणनीति तैयार की गई थी. इस मौके पर केंद्रीय गृह मंत्री ने CRPF, BSF समेत सभी केंद्रीय सुरक्षा एजेंसियों को स्पष्ट निर्देश दिए थे कि वे माओवाद के खिलाफ एक ठोस और समयबद्ध कार्ययोजना तैयार करें. यही वह बिंदु था, जहां से निर्णायक रणनीति की शुरुआत हुई. 

24 अगस्त 2024 को तय हुई थी अंतिम डेडलाइन

इसके बाद 24 अगस्त 2024 को उच्चस्तरीय बैठक में अभियान को अंतिम रूप दिया गया. इसी बैठक में 31 मार्च 2026 तक माओवाद खत्म करने की समयसीमा तय की गई. यह डेडलाइन पूरे अभियान का केंद्र बिंदु बनी. 

 तकनीक और इंटेलिजेंस ने बदली लड़ाई की दिशा

शर्मा ने बताया कि डेडलाइन तय होने के बाद सुरक्षाबलों ने तेज और सटीक ऑपरेशन शुरू किए. इस बार एंटीनक्सल अभियान में तकनीक आधारित इंटेलिजेंस सपोर्ट ने बड़ी भूमिका निभाई. घने जंगलों में भी माओवादियों की गतिविधियों पर नजर रखना संभव हो पाया. आधुनिक उपकरणों और रियलटाइम जानकारी के कारण सुरक्षा बलों को ऑपरेशन में निर्णायक बढ़त मिली. 

‘गोली और बोली' की नीति हुई सफल

उन्होंने कहा कि सरकार ने सिर्फ सशस्त्र कार्रवाई पर ही निर्भर नहीं किया, बल्कि “गोली और बोली” की रणनीति अपनाई. जहां जरूरत पड़ी, वहां कड़ी कार्रवाई की गई, वहीं दूसरी ओर संवाद और समझाइश के जरिए लोगों को मुख्यधारा से जोड़ने का प्रयास किया गया. छत्तीसगढ़ में उप मुख्यमंत्री विजय शर्मा ने बस्तर क्षेत्र के आदिवासी समाज प्रमुखों, सरपंचों और पंचों से लगातार संवाद किया. उनकी समस्याओं को समझा गया और त्वरित समाधान देकर विश्वास कायम किया गया.

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 सामाजिक भरोसा बना सबसे बड़ा हथियार

सरकार और प्रशासन ने स्थानीय समाज का भरोसा जीतने पर खास ध्यान दिया. जब लोगों में विश्वास का माहौल बना, तो माओवादियों ने भी आत्मसमर्पण और पुनर्वास की राह अपनानी शुरू की. पुनर्वास नीति को प्रभावी ढंग से लागू किया गया, जिससे कई बड़े कैडर के नक्सली भी हिंसा का रास्ता छोड़कर मुख्यधारा में शामिल हुए. इस प्रक्रिया में मीडिया और सामाजिक संगठनों की भूमिका भी अहम रही.

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शर्मा ने बताया कि लगातार ऑपरेशन, तकनीकी समर्थन, सामाजिक संवाद और पुनर्वास नीति के संयुक्त प्रयासों से 584 दिनों में माओवाद के खात्मे का दावा किया गया है. यह अभियान देश के आंतरिक सुरक्षा इतिहास में एक अहम मील का पत्थर माना जा रहा है.

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