IPS Kamlochan Kashyap: इनके नाम से थर्रा जाते थे नक्सली, रिटायरमेंट के बाद बने OSD, जानिए इस अफसर के बारे में सबकुछ 

IPS Kamlochan Kashyap Profile: आज हम आपको एक ऐसे जांबाज पुलिस अफसर के बारे में बताने जा रहे हैं, जिन्होंने नक्सलियों के खूब छक्के छुड़ाए हैं.रिटायरमेंट के बाद सरकार ने उन्हें एक महत्वपूर्ण जिम्मेदारी दी है. आइए जानते हैं ... 

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रिटायर्ड आईपीएस अफसर कमलोचन कश्यप

IPS Officer Kamlochan Kashyap: छत्तीसगढ़ में नक्सलवाद अब अंतिम सांसें गिन रहा है. बस्तर के इतिहास में नक्सलियों के छक्के छुड़ाने वाले अफसरों में जिन अफसरों का नाम गिना जाएगा, उनमें से एक बेहद खास नाम है आईपीएस अफसर कमलोचन कश्यप का. ज्यादातर वक्त उन्होंने बस्तर में बिताया है. नक्सल अभियान में ऐसा कमाल किया कि इनके नाम से ही नक्सली थर्राते थे. हालही में वे रिटायर्ड हुए हैं. लेकिन सरकार ने उन्हें पुलिस मुख्यालय में विशेष कर्तव्यस्थ अधिकारी नियुक्त कर एक बड़ी जिम्मेदारी फिर से दे दी है. इसके लिए आदेश भी जारी हो गया है. आइए जानते हैं इनके बारे में... 

आईपीएस अफसर कमलोचन कश्यप बस्तर जिले के ही एक छोटे से गांव के रहने वाले हैं. उन्होंने अपनी ग्रेजुएशन तक की पढ़ाई गांव और फिर जगदलपुर के कॉलेज से की थी. साल 1994 के वे मध्य प्रदेश लोक सेवा आयोग की परीक्षा पास कर डीएसपी बने थे. वे खरगोन, उज्जैन, रायगढ़, राजनांदगांव जैसे जिले में बतौर एसडीओपी, सीएसपी पोस्टेड रहे. 

सबसे ज्यादा नक्सल इलाकों में पोस्टिंग

कमलोचन कश्यप अपने करियर के कई सालों में सबसे ज्यादा नक्सल इलाके में पोस्टेड रहे हैं. इनमें गरियाबंद, बीजापुर, दंतेवाड़ा, राजनांदगांव जिले शामिल हैं. इसके बाद वे इसी इलाके में डीआईजी बने और एक जनवरी 2026 को रिटायर्ड हो गए.

इन्हें राष्ट्रपति का पुलिस पदक (सराहनीय सेवा), राष्ट्रपति का पुलिस पदक (वीरता), राष्ट्रपति का पुलिस पदक (विशिष्ट सेवा), केंद्रीय गृहमंत्री दक्षता पदक से भी नवाजा गया है. 

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चरम पर था नक्सलवाद तब से छुड़ा रहे छक्के 

बस्तर में जब नक्सलवाद बेहद चरम पर था, तब से वे नक्सलियों के छक्के छुड़ाते रहे हैं. दंतेवाड़ा जिले में बतौर एसपी रहते हुए 78 मुठभेड़ों में 45 हार्डकोर नक्सलियों को ढेर किया था. बीजापुर, राजनांदगांव में भी कई मुठभेड़ों में 30 से ज्यादा माओवादी ढेर हुए थे. इनकी खासियत ये रही है कि कम बोलना,सटीक बोलना और काम पर फोकस रख प्रचार से दूर रहना रहा है. बस्तर के ही निवासी होने के कारण स्थानीय बोली का अच्छा ज्ञान रहा है, यही वजह रही कि इन्हें इन इलाकों में काम करने में ज्यादा दिक्कत नहीं हुई. इनके नाम से नक्सलियों में भी भारी दहशत रहा. डीआईजी बनने के बाद भी इलाके में नक्सल अभियान में कई बड़े योगदान दिए हैं. 

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