100 करोड़ से ज्यादा की अमृत मिशन योजना, फिर भी बिलासपुर शहर है प्यासा

जल संकट से निपटने के लिए नगर निगम ने 22 टैंकरों के जरिए पानी पहुंचाने की व्यवस्था की है, लेकिन यह व्यवस्था घनी आबादी वाले इलाकों के लिए नाकाफी साबित हो रही है. तालापारा, सरकंडा, जरहाभाठा, चांटीडीह, चिंगराजपारा सहित कई क्षेत्रों में लोगों को घंटों इंतजार के बाद भी पर्याप्त पानी नहीं मिल पा रहा है.

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बिलासपुर शहर में पेयजल व्यवस्था सुधारने के उद्देश्य से अमृत मिशन योजना के तहत लगभग 100 करोड़ रुपये खर्च किए गए, लेकिन मौजूदा हालात इस योजना की प्रभावशीलता पर गंभीर सवाल खड़े कर रहे हैं. शहर एक बार फिर भीषण जल संकट की चपेट में है और हजारों परिवारों को पीने के पानी के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है.

तकनीकी खराबी से ठप हुई जलापूर्ति

अमृत मिशन के अंतर्गत संचालित बिरकोना वाटर ट्रीटमेंट प्लांट में आई तकनीकी खराबी ने पूरे सिस्टम को प्रभावित कर दिया है. प्लांट के एक महत्वपूर्ण वाल्व में खराबी आने के बाद शहर की नल जलापूर्ति पूरी तरह बंद हो गई है. इसका सीधा असर करीब 25 हज़ार से अधिक घरों पर पड़ रहा है,जहां एक-एक बूंद पानी के लिए लोग तरस रहे हैं. नगर निगम ने आपात स्थिति में पुराने पंपों को चालू करने की कोशिश की, लेकिन इनमें से अधिकांश पंपों से पानी की जगह हवा निकलती रही. वैकल्पिक व्यवस्था भी नाकाम साबित हुई.

टैंकरों के भरोसे शहर

जल संकट से निपटने के लिए नगर निगम ने 22 टैंकरों के जरिए पानी पहुंचाने की व्यवस्था की है, लेकिन यह व्यवस्था घनी आबादी वाले इलाकों के लिए नाकाफी साबित हो रही है. तालापारा, सरकंडा, जरहाभाठा, चांटीडीह, चिंगराजपारा सहित कई क्षेत्रों में लोगों को घंटों इंतजार के बाद भी पर्याप्त पानी नहीं मिल पा रहा है. हालात ऐसे हैं कि कई इलाकों में विवाद और नाराजगी की स्थिति बन रही है.

जल संकट के बीच नाचते नजर आए अफसर

इसी बीच सोशल मीडिया पर बिलासपुर कलेक्टर संजय अग्रवाल और अधिकारियों का एक वीडियो वायरल हो रहा है, जिसमें वे एक कार्यक्रम के दौरान झूमते-नाचते नजर आए. वीडियो सामने आने के बाद नागरिकों और विपक्षी संगठनों में नाराजगी देखी जा रही है. लोगों का कहना है कि जब शहर गंभीर जल संकट से जूझ रहा है, तब प्रशासनिक जिम्मेदारों का इस तरह सार्वजनिक कार्यक्रमों में व्यस्त रहना असंवेदनशीलता को दर्शाता है.

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उठते सवाल जवाबदेही किसकी?

सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब पेयजल व्यवस्था पर 100 करोड़ रुपये खर्च किए गए, तो बार-बार इस तरह की स्थिति क्यों बन रही है. क्या रखरखाव में लापरवाही हुई या फिर योजना के क्रियान्वयन में ही खामियां हैं? शहरवासियों में यह चिंता भी गहराने लगी है कि कहीं बिलासपुर भी जल संकट के मामले में इंदौर जैसे हालात की ओर तो नहीं बढ़ रहा है.

फिलहाल, नगर निगम नियमित जलापूर्ति बहाल करने के दावे कर रहा है, लेकिन जब तक स्थायी समाधान सामने नहीं आता है, तब तक शहर की प्यास और लोगों के सवाल दोनों बने रहेंगे.

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