इंदौर: मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर पीठ ने दुष्कर्म पीड़िताओं के गर्भपात को लेकर एक बेहद महत्वपूर्ण और संवेदनशील कानूनी स्थिति स्पष्ट की है. अदालत ने कहा है कि 18 सप्ताह तक की गर्भावस्था समाप्त कराने के लिए पीड़िता को अलग से अदालत के चक्कर लगाने या अनुमति लेने की कोई आवश्यकता नहीं है. मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी (MTP) एक्ट के तहत ऐसी परिस्थितियों के लिए पर्याप्त कानूनी प्रावधान पहले से ही मौजूद हैं.
16 साल की पीड़िता की याचिका पर आया फैसला
यह महत्वपूर्ण टिप्पणी 16 वर्षीय दुष्कर्म पीड़िता के पिता की ओर से दायर रिट याचिका पर सुनवाई के दौरान आई. याचिका में पीड़िता की 18 सप्ताह की अनचाही गर्भावस्था को समाप्त करने की अनुमति मांगी गई थी. दरअसल, नाबालिग बच्ची का अपहरण कर उसके साथ दुष्कर्म किया गया था. पीड़िता ने अदालत को बताया था कि इस आपराधिक घटना के कारण ठहरा गर्भ उसके लिए असहनीय मानसिक पीड़ा और गहरे मानसिक आघात का कारण है, इसलिए वह इसे जारी नहीं रखना चाहती.
20 हफ्ते की गर्भावस्था के बाद डॉक्टर की राय जरूरी
मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति संदीप एन भट्ट की एकल पीठ ने की. सुनवाई के दौरान कोर्ट ने 2025 में हाईकोर्ट की खंडपीठ द्वारा दिए गए पूर्व निर्णय का भी संदर्भ दिया. अदालत ने स्पष्ट किया कि MTP एक्ट के तहत 20 सप्ताह तक की गर्भावस्था सिर्फ एक पंजीकृत चिकित्सा अधिकारी की राय से समाप्त कराई जा सकती है. 20 से 24 सप्ताह में गर्भपात कराने के लिए दो पंजीकृत चिकित्सकों की लिखित राय होना आवश्यक होता है.
अस्पतालों के लिए जारी हुए सख्त निर्देश
मामले में पीड़िता के वकील आशीष चौबे ने पक्ष रखते हुए कहा कि 24 सप्ताह तक के ऐसे मामलों में संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत हाईकोर्ट से न्यायिक अनुमति लेना जरूरी नहीं है. अदालत ने इस मामले पर संज्ञान लेते हुए स्वास्थ्य विभाग के आयुक्त को सख्त निर्देश दिए हैं कि इस आदेश और कानून की पूरी जानकारी प्रदेश के सभी सरकारी व निजी अस्पतालों तक तुरंत पहुंचाई जाए. इसका मकसद यह सुनिश्चित करना है कि दुष्कर्म की शिकार पीड़िताओं और उनके परिजनों को इलाज के लिए अस्पतालों में अनावश्यक अदालती प्रक्रियाओं या लालफीताशाही से न गुजरना पड़े.