गांवों में नुक्‍कड़ से मायानगरी के राष्‍ट्रीय मंच तक... युवा रंगकर्मी ने ऐसे बढ़ाया अंबिकापुर का मान

छत्तीसगढ़ के अंबिकापुर से निकलकर मुंबई के NMACC मंच तक पहुंचे युवा रंगकर्मी और अभिनेता संजय कुमार साहू की प्रेरक यात्रा. जानिए कैसे नुक्कड़ नाटकों से शुरुआत कर उन्होंने राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनाई.

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छत्तीसगढ़ के छोटे से शहर अंबिकापुर की गलियों में नुक्कड़ नाटकों से अपनी पहचान बनाने वाले रंगकर्मी और अभिनेता संजय कुमार साहू ने हाल ही में देश के प्रमुख कल्‍चरल सेंटर्स में से एक 'NMA कल्चरल सेंटर' मुंबई में एक शानदार नाटक की प्रस्‍तुति दी है, जिसने देशभर के रंगकर्मियों का ध्यान खींचा है. संजय इससे प‍हले सोनी लिव (Sony Liv) की पॉपुलर क्राइम-थ्रिलर मॉक्युमेंट्री वेब सीरिज 'ब्‍लैक, व्‍हाइट एंड ग्रे- लव किल्‍स' में लीड रोल निभा चुके हैं. 

संजय के मुताबिक, कला के इस सफर को किसी अचानक मिली सफलता के बजाय वर्षों के निरंतर अभ्यास, रंगमंचीय अनुशासन और जमीनी अनुभवों का परिणाम माना जा सकता है.

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संजय ने NDTV को बताया कि उन्‍होंने अपने शुरुआती दिनों में स्थानीय मुद्दों, सामाजिक चेतना और जनसामान्य की समस्याओं को नुक्कड़ नाटकों के माध्यम से प्रस्तुत किया. वे अपनी इस यात्रा में अपने गुरु श्री कृष्णा नंद तिवारी सर के योगदान को महत्वपूर्ण मानते हैं.

उनके अनुसार, लगभग पाँच वर्षों तक गांव-गांव और गलियों में घूमकर नुक्कड़ नाटक करने के दौरान उन्हें केवल अभिनय ही नहीं, बल्कि रंगमंच के अनुशासन और समाज के प्रति एक कलाकार के दायित्व को समझने का अवसर मिला.

राष्ट्रीय मंच पर 'बोरो होर मर चुका है' की प्रस्तुति

हाल ही में NMACC में मंचित नाटक 'बोरो होर मर चुका है' के माध्यम से संजय कुमार साहू ने अपनी अभिनय क्षमता का परिचय दिया. गगन श्रीवास्तव ने इसे रूपांतरित और निर्देशित किया है. इस नाटक की पृष्ठभूमि आदिवासी जीवन, पहचान, विस्थापन और अस्तित्व के सवालों के इर्द-गिर्द बुनी गई है. नाटक में विकास की प्रक्रिया के बीच हाशिए पर धकेले जाते समुदायों की पीड़ा और उनकी सांस्कृतिक अस्मिता के संघर्ष को दर्शाने का प्रयास किया गया है.संजय कुमार साहू ने इस नाटक में अपनी भूमिका को सहज और संतुलित ढंग से प्रस्तुत किया. उनके साथ कलाकार मुक्ति दास और अन्य सहयोगियों ने भी पटकथा के अनुरूप भूमिकाएँ निभाईं. नाटक में लोकधुनों, शारीरिक अभिनय, प्रकाश-व्यवस्था और मंच-सज्जा के समन्वय ने दृश्य संरचना को विषय-वस्तु के अनुकूल बनाए रखा.

जमीनी रंगकर्म की सार्थकता 

अंबिकापुर के स्थानीय मंचों से लेकर मुंबई के NMACC जैसे बड़े परिसर तक पहुंचने की यह यात्रा दर्शाती है कि क्षेत्रीय स्तर पर किए जाने वाले समर्पित रंगकर्म का भी अपना महत्व होता है. साधन और अवसर अपनी जगह महत्वपूर्ण हैं, लेकिन जमीनी स्तर का अभ्यास और निरंतरता कलाकार की नींव को मजबूत बनाती है. संजय कहते हैं, 'यह प्रस्तुति इस बात का भी उदाहरण है कि जब निर्देशन, अभिनय, संगीत और प्रोडक्शन डिज़ाइन एक सुविचारित दिशा में कार्य करते हैं, तो रंगमंच दर्शकों के सामने गंभीर सामाजिक विषयों को स्पष्टता से रखने में सफल होता है.' 'बोरो होर मर चुका है' नाटक के जरिए क्षेत्रीय संवेदनाओं और जमीनी मुद्दों को राष्ट्रीय मंचों तक पहुंचाने का एक सार्थक प्रयास देखने को मिला है.
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